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रविवार, 15 अप्रैल 2018

भारतीय सत्ता व न्याय तंत्र से कितनी दूर हैं हम विमुक्त घुमन्तु और अर्द्धघुमन्तु लोग?

भारतीय सत्ता व न्याय तंत्र से कितनी दूर हैं हम विमुक्त घुमन्तु और अर्द्धघुमन्तु लोग?
(पूरा पढ़ें और सहमत हो तो समाज के भले के लिए शेयर करें)
   70 वर्षों में हर वर्ग के लिए कानून बने हैं, समाजिक, आर्थिक, समाजिक व न्यायिक भागीदारी सुनिश्चित करने की कोशिश हुई है। परन्तु भारत मे पायी जाने वाले 840+ घुमन्तु वर्गों (राजस्थान में 52+) के 5 करोड़ से ज्यादा नागरिक आज भी इससे कोसों दूर ही खड़े नजर आते हैं। जब-जब भी किसी ज्वलन्त समस्या जैसे बलात्कार और नरसंहार आदि की घटना के विरोध में मोमबत्ती मार्च निकले हैं, वे उस मोमबत्ती के बुझने के साथ ही बुझ गए हैं। परंतु हमे रुकना नही है, वर्ग के हक़ों को अंजाम देना ही हम शिक्षित भाइयों की प्रथम जिम्मेदारी बन जाती है।
   जब 2014 में नरेंद्र मोदी इलाहाबाद में एक बड़ी रैली को संबोधित कर रहे थे तो इन समुदायों के एक प्रतिनिधिमंडल ने उनसे आरक्षण की मांग की और एक ज्ञापन सौंपा. जब उनकी सरकार बनी तो भिखूजी_इदाते की अध्यक्षता में एक #आयोग का गठन किया गया है। आयोग का कार्यकाल अभी पूरा नहीं हुआ है और वह देश के विभिन्न हिस्सों के घुमंतू और विमुक्त जनजातियों के प्रतिनिधियों से मिल रहा है। हम अपने पिछड़ेपन का दोष सरकार की नीतियों को देते हैं और इस बात की आवश्यकता महसूस करते हैं कि नीतियों के कार्यान्वयन पर नजर रखी जाये। इसकी वकालत 2005 में बने #रेणके_कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में किया है.
इन घुमंतू समुदायों के बारे में कभी शायर असराल-उल-हक़ मजाज़ ने कहा था-
"बस्ती से थोड़ी दूर, चट्टानों के दरमियां
ठहरा हुआ है ख़ानाबदोशों का कारवां
उनकी कहीं जमीन, न उनका कहीं मकां
फिरते हैं यूं ही शामों-सहर ज़ेरे आसमां ।"
   कुछ महत्वपूर्ण बिंदु हैं जिन पर सोचना और सरकार से माँग करना हमारी जिम्मेदारी बन जाती है।
  हमे न्याय क्यों नही मिलता ?
    1.ये साल के 4 मौसमों के अनुसार स्थान बदल रहे हैं । आज असिफ़ा का परिवार भी इस घटना को नियति का खेल मानकर वहाँ से अपने पशुओं को पालने अन्य प्रदेश में जा चुका है। आप सोच सकते हैं वे कैसे अदालतों में केस लड़ पाएंगे। आलम यह है कि वे वकीलों के पास नही जा रहे, वकील उन्हें ढूंढेंगे।
   2. घुमन्तु वर्ग के मामलों को देखने के लिए "फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट" होने ही चाहिए, हम तो हर मौसम के अनुसार जगह बदलते हैं, लम्बी चलने वाली भारतीय न्याय प्रक्रिया में कैसे लड़ पाएंगे। जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने भी इस केस में फास्टट्रैक कोर्ट बनाने का समर्थन किया है, परन्तु यह तो एक केस मात्र है।
   3. पूर्णतः पक्षपात पूर्ण रवैये (जैसा कि जम्मू बार काउंसिल ने किया है) के कारण उन्हें कहाँ भारतीय स्थानीय न्याय व्यवस्था में न्याय मिलना सम्भव है। इसीलिए भारतीय व्यवस्था और संयुक्त राष्ट्र संघ भी संदेह करने को मजबूर हुआ है।
   4. सदियों से परम्परागत तौर तरीकों से प्राकृतिक संरक्षण करने वाले (जिनके प्रयासो का UNO भी समर्थन करता है, ये कबीले दुनिया व भारत सरकार के प्रकृति बचाने के प्रयासों का आधार हैं।) इन कबीलों के बच्चों की शिक्षा, नौकरी व सामाजिक विकास के लिए कोई बुनियादी और जवाबदेह व्यवस्था नही है, क्योंकि ये लोग घुमन्तु होने के कारण अपनी माँगों को लेकर कोई प्रदर्शन नही कर पाए, वोट बैंक नही बन पाये।। आपको सोचकर शर्म महसूस होगी कि न्यायिक व सामाजिक सुरक्षा तो दूर की बात है, उन्हें खाद्य_व_स्वास्थ्य_सुरक्षा तक नही दी गयी है।
  5. भारतीय लोकतन्त्र में दोनो सदनों और विधानसभाओं में घुमन्तु वर्ग के लिए सीटें सुनिश्चित होनी चाहिए ताकि इस वर्ग का नुमाइंदा इस बेसहारा और उपेक्षित वर्ग की आवाज़ बुलंद कर सकें। आज तक भारतीय संसद इनके हक़ों के लिए सोच ही नही सकी क्योंकि कोई इन्हें जानने वाला और समुचित पैरवी करने वाला वहाँ मौजूद ही नही है।
  6. 1971 व 1999 के युध्द में भारतीय सेना को आक्रमण की प्रथम सूचना देने वाली, फौज को सहयोग के कारण कई वीरता पुरस्कारों से नवाजी जानी वाली इस गुज्जर बकरवाल कौम को आज मुस्लिम होने के कारण रोहिंग्या घोषित करने की कोशिश की जा रही है। इस सत्ता समर्थित साम्प्रदायिक सोच के कारण इन्हें न्याय कैसे मिल सकता है?
  इसलिए जरूरी है कि भारत सरकार...
★एक "विमुक्त, घुमन्तु, अर्द्धघुमन्तु न्यायिक, सामाजिक व सवैंधानिक आयोग" की स्थापना करें जो सिर्फ हमारी (घुमन्तु वर्ग में हर धर्म के अनुयायी है) आवाज़ को सत्ता के कानों तक पहुँचा सकें, जिसकी निगरानी सीधे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस या सीनियर जजों का एक पैनल करें और देश मे इन वर्गों के साथ कहीं भी कोई शोषण की घटना होती है, तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय स्वसंज्ञान लेकर त्वरित कार्यवाही करने का जिम्मा लें।
★ घुमन्तु वर्ग के लिए उपरोक्त आयोग व सीधे सर्वोच्च न्यायलय में फास्टट्रैक कोर्ट में त्वरित न्याय मिलें, क्योंकि वे साल में 4 बार जगह बदलते हैं।
★बुनियादी विकास के लिए मुफ्त शिक्षा व वाजिब घुमन्तु व जनजाति आरक्षण का प्रावधान किया जाये।
★विमुक्त, घुमन्तु एवं अर्द्धघुमन्तु वर्ग की समस्याओं के निराकरण के लिए देशभर में संभाग/जिले/खण्ड स्तर पर आयोग की एक निश्चित समयांतराल में बैठक आयोजित हो, जिसमे सिटींग बोर्ड में इस वर्ग के चुने हुए नुमाइंदे भी बैठे।
   अब तक हमारे महासभाओं, सेनाओं के नेता सोच ही नही पाये, कुछेक हैं जो इस बाबत जमीनी प्रयास कर रहें है।
अंतहीन सड़कों का जाल है, चलते जाना है यायावर....|
(पोस्ट संशोधन योग्य और कई बिंदुओं से अनछुई हो सकती है, आप अपने अनुसार संशोधित कर सकते हैं।, अवगत भी करवा दें)

विजय गुर्जर
झालावाड़ (राजस्थान)

वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ की कलम से म्हारो थारो के हुयो!

म्हारो थारो के हुयो !

(जयपुर)
नारायण बारेठ राजस्थान के मशहूर पत्रकार की कलम से

ये जम्मू कश्मीर में उस जबान का हिस्सा है जो गूजर- बकरवाल बोलते है।कश्मीर में चौधरी मसूद उस  गूजर समुदाय के पहले ग्रेजुएट है। वे पुलिस सेवा में एडिशनल डी जी पद तक  पहुंचे और फिर राजौरी में एक यूनिवर्सिटी के संस्थापक कुलपति भी रहे।कहने लगे 'गूजर रोजमर्रा में म्हारो थारो जैसे शब्द खूब बोलते है। क्योंकि गुजरी भाषा राजस्थानी के करीब है।
कश्मीर  में ऐसे तत्वों को कोई कमी नहीं है जो किसी बात पर सरहद के उस पार देखते है। लेकिन बकरवाल गूजर जब भी कोई दुःख तकलीफ आती है ,दिल्ली की तरफ देखते है। उनके डेरे सरहद के  आस पास है। कई बार दहशगर्दों ने उनके डेरे  तोड़फोड़ दिए और नुकसान पहुंचाया।
भारत की विविधता उसकी ताकत है।कही भाषा ,कही लिबास ,कही खान पान ,कही आस्था और कही परम्पराये एक दूजे को जोड़ती है।कुछ लोग परस्पर जोड़ने के जरिये ढूंढ कर सुकून महसूस करते है ,कुछ लोग तोड़ने के बहाने  तलाशते रहते है।फासले बढ़ाने से बढ़ते है ,घटाने से घटते है।
चौधरी मसूद कहते है -कहीं वे बनहार है ,कही बन गुजर है ,कही बकरवाल है। मगर हं सब एक ही। ये पहाड़ो में है तो ,मैदानों में भी।कोई काश्त कार है ,कोई पशुपालक।
भारत में ब्रिटिश दौर में जॉर्ज अब्राहिम ग्रियर्सन  इंडियन सिविल सर्विस के कर्मचारी के रूप में भारत आये। उन्होंने भारत में भाषाओ पर बहुत काम किया। उन्हें  लिंग्विस्टिक सर्वे ऑव इंडिया" का प्रेणता माना जाता है।  उन्होंने ने गुजरी भाषा  को राजस्थानी बोली बताया और कहा ये मेवाती के करीब है और मेवाड़ी से भी मिलती जुलती है।  गुजरी जबान उर्दू प्रभाव वाले क्षेत्रो में बोली जाती है और इसमें प्रभाव क्षेत्र में बड़ा पहाड़ी इलाका है। इस जबान का पूँछी ,पंजाबी ,कश्मीरी और डोगरी पर भी प्रभाव है।जम्मू कश्मीर में कश्मीरी और डोगरी के बाद यह सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा है।
इटालियन विद्वान टैसीटोरी ने भी राजस्थान में भाषा और संस्कृति पर बहुत सराहनीय काम किया है। वे रियासतकाल में  बीकानेर रहे। उन्होंने भी राजस्थानी भाषा और गुजरी जबान में निकट रिश्तो की बात कही थी।
संस्कृत भाषाओ की जननी है। शब्दों की बानगी देखिये संस्कृत में कर्म है। यही राजस्थानी ,गुजरी ,कांगड़ी ,पंजाबी और हिंदी में 'काम' हो जाता  है। संस्कृत में कर्ण है। इन सब भाषाओ में सुनंने के  मानव अंग को कान कहते है।संस्कृत में मस्त से मस्तिक बना। यानि ललाट। राजस्थानी और गुजरी में इसे माथो कहते है। पंजाबी और कांगड़ी में मथा है।संस्कृत में तप्त मतलब गर्म। गुजरी में तातो ,राजस्थानी में भी कमोबेश तातो या तातोज ,कांगड़ी और पंजाबी में ताता है।
संस्कृत में वस्ति है। गुजरी और राजस्थानी में बासनो है।
       भाषाओ ने इंसान की तरह अपना दिल और शामियाना कभी छोटा नहीं रखा।जब भी नए शब्द आये ,भाषा ने उसे गले लगाया और आत्मसात कर लिया।कौन यकीन करेगा अलमारी ,आलपिन और बाल्टी पुर्तगाल जबान  से आये और हिंदी के कुनबे का हिस्सा बन गए। शब्दों की यह यात्रा एक तरफा नहीं है। जयपुर के कर्नल पूर्ण  सिंह ने फ्रेंच भषा में  राजस्थानी से मिलते चार सो शब्द ढूंढ निकाले।
जब हम भी अपने दिल का दयार भाषा की तरह बड़ा कर लेंगे ,नफरत और परायेपन की दीवारे भरभार कर जमीन पर आ गिरेगी।
सादर  
Photo courtesy copy paste

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

मीडिया में बनाए केरियर

मीडिया को कॅरियर फिल्ड बनाने के लिए युवाओं में एक अलग उत्साह रहता है। यों तो राजधानी में मीडिया संबंधी कई कोर्स चलाए जा रहे हैं, लेकिन बेहतर पढ़ाई, मूलभूत सुविधाएं और अच्छे प्लेसमेंट के लिए युवा शहर के बाहर का रुख करते हैं। अधिकतर स्टूडेंट्स चाहते हैं कि वो देश के टॉप संस्थानों से मास कम्यूनिकेशन का कोर्स करें ताकि अच्छी पढ़ाई व सिक्योर भविष्य भी मिल सके। देश में पत्रकारिता का कोर्स चलाने वाले सबसे प्रतिष्ठित संस्थान भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) की प्रवेश परीक्षा में कुछ ही दिन शेष हैं। मीडिया में कॅरियर बनाने के इच्छुक छात्र इस अवसर को गंवाना नहीं चाहते। कुछ छात्रों की तैयारी हो चुकी है लेकिन कुछ अब भी कन्फ्यूज है। बचे हुए दिनों में कैसे करें तैयारी और किन बातों का रखें ध्यान।

कैसे करें तैयारी
आईआईएमसी के किसी भी कोर्स में प्रवेश पाने के लिए यह जरूरी है कि आसपास हो रहे घटनाक्रमों से अवगत रहें। किसी भी कोर्स में दाखिला पाने के लिए आप पिछले दो-तीन सालों के प्रश्न पत्रों का अध्ययन कर सकते हैं। सारे प्रश्न पत्रों की सूची संस्थान की वेबसाइट पर उपलब्ध है। इस संस्थान में दाखिला लेने के लिए आपके पास सभी विषयों की जानकारी जरूरी हैं।

ऐसे होता है दाखिला
संस्थान में संचालित होने वाले कोर्स में एडमिशन से जुड़ी सारी जानकारी आईआईएमसी की साइट (www.iimc.nic.in) पर उपलब्ध है। लेकिन मोटे तौर पर देखा जाए तो यहां प्रमुख रूप से चार कोर्स चलाए जाते हैं।

कोर्स में एडमिशन के लिए सबसे पहले एक लिखित परीक्षा ली जाती है। इसके बाद चयनित छात्रों को जीडी और इंटरव्यू का सामना करना पड़ता है। यह परीक्षा 100 अंकों की होती है। इसमें लिखित परीक्षा और साक्षात्कार का रेसियो 85:15 का निर्धारित किया गया है।

आईआईएमसी हिंदी पत्रकारिता के डायरेक्टर प्रो आनंद प्रधान के टिप्स
1. आपके पास देश दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक हलचलों का ज्ञान हो।
2. उन समसामायिक घटनाओं के पीछे राजनीतिक, आर्थिक कारणों और प्रक्रियाओं पर भी हो नजर।
3. किसी भी जानकारी को समझदारी और बेहतर ढंग से व्यक्त करने की क्षमता हो।
4. आप अच्छा लिख सकें।
5. भाषा अच्छी हो साथ ही लिखने का अंदाज रचनात्मक हो।
6. किसी भी विचार को अभिव्यक्त करने का अंदाज अलग हो।
7. अवलोकन की क्षमता हो। यानी आपके आसपास की घटनाओं और बदलाव पर नजर हो।
8. तर्क, विश्लेषण व वर्णन की क्षमता भी जरूरी है।
9. परीक्षा में कुछ ही दिन बाकी हैं। ऐसे में जरूरी है कि आप पिछले कुछ दिनों के अखबार देख लें।
10. अखबारों में संपादकीय के साथ देश दुनिया की खबरें भी पढ़ लें
11. पिछले कुछ दिनों की पत्रिकाएं भी पढ़ लें।
11. हाल-फिलहाल रिलीज कोई फिल्म भी देखें और उसकी समीक्षा तैयार कर लें।
12. परीक्षा की तैयारी लगभग स्टूडेंट्स की हो चुकी है, जरूरी है कि अपने नोट्स दोबारा देख लें।

विकसित देशों में भी है आरक्षण

विदेशों_विकसित_देशों_में_भी_है_आरक्षण

आजकल देश में SC_ST व OBC आरक्षण के विरोध मे जोरदार हवा चल रही है।
आरक्षण के खिलाफ कई तरह के तर्क कुतर्क किये जाते है। उनके कुछ तर्को में आरक्षण विरोधियों का सबसे पहला तर्क होता है कि दूसरे देशो मे आरक्षण नहीं है इसलिये वो हमसे ज्यादा प्रगितिशील है। जो बिल्कुल गलत है।

विदेशो मे भी आरक्षण की पद्धति है। अमरिका, चीन, जापान जैसे देशों में भी आरक्षण है ।
बाहरी देशों में आरक्षण को #Affirmative_Action कहा जाता है। Affirmative Action मतलब समाज के "#वर्ण " तथा "#नस्लभेद" के शिकार लोगो के लिये सामाजिक समता का प्रावधान है ।

1961 को #संयुक्त_राष्ट्र की बैठक मे सभी प्रकार के वर्ण अथवा नस्लभेद रंगभेद के खिलाफ कड़ा कानून बना। इसके तहत संयुक्त राष्ट्र में सम्मिलित सभी देशो ने अपने देश के शोषित किये हुए वर्ग को (दलित/आदिवासी) की मदद करके उन्हें समाज मे स्थापित करने का निर्णय लिया है। इसी के तहत अलग अलग देशो ने अलग अलग तरीके से आरक्षण लागु है।

#अन्य_देशो_में_आरक्षण
#ब्राजील में आरक्षण Vestibular नाम से जाना जाता है।
#कनाडा में समान रोजगार का तत्व है जिसके तहत फायदा वहाँ के असामन्य तथा अल्पसंख्यकों को होता है।
#चीन में महिला और तात्विक अल्पसंख्यको के लिये आरक्षण है।
#फिनलैंड मे #स्वीडीश लोगो के लिये आरक्षण है।
#जर्मनी में जिमनॅशियम सिस्टम है ।
#इसरायल में Affirmative Action तहत आरक्षण है ।
#जापान जैसे सबसे प्रगत देश में भी बुराकूमिन लोगो के लिये आरक्षण है (बुराकूमिन जापान के हक वंचित दलित लोग हैं )
#मॅसेडोनिया में #अल्बानियन के लिये आरक्षण है ।

#मलेशिया में भी उनकी नई आर्थिक योजना के तहत आरक्षण जारी हुए है ।
#न्यूजीलैंड में माओरिस और पॉलिनेशियन लोगो के लिये Affirmative Action का आरक्षण है ।
#नॉर्वे मे 40 % महिला आरक्षण है पीसीएल बोर्ड में।
#रोमानिया मे शोषण के शिकार रोमन लोगों के लिये आरक्षण है ।
#दक्षिण आफ्रिका मे रोजगार समता (काले गोरे लोगो को समान रोजगार) आरक्षण है ।
#दक्षिण_कोरिया मे उत्तरी कोरिया तथा चीनी लोगों के लिये आरक्षण है ।
#श्रीलंका मे तमिल तथा क्रिश्चियन लोगो के लिये अलग नियम अर्थात आरक्षण है ।
#स्वीडन मे General Affirmative Action के तहत आरक्षण मिलता है ।
इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्र #अमरिका में भी Affirmative Action के तहत आरक्षण है ।
अगर इतने सारे देशों में आरक्षण है (जिनमे कई विकसित देश भी शामिल है) तो फिर भारत का आरक्षण किस प्रकार भारत की प्रगति में बाधक है। यहां तो सबसे ज्यादा लोग जातिभेद के ही शिकार हैं । तो फिर दलित तथा पिछड़े वर्ग को क्यों न मिले आरक्षण..??

अगर आरक्षण हट गया तो फिर से एक ही " विशीष्ट " वर्ग का शासन तथा उद्योग व्यवसायों पर कब्जा होगा, फिर ऐसे में किस प्रकार देश की प्रगति होगी। भारत सिर्फ किसी विशीष्ट समुदाय के लोगो का देश नहीं है, सिर्फ एक वर्ग विशेष की प्रगति से भारत की प्रगति नहीं होगा।
जब तक भारत के सभी जाति धर्म के लोग शिक्षा, नौकरी तथा
सरकार में समान रुप से प्रतिनिधित्व नहीं करेंगे , तब तकदेश प्रगति नहीं करेगा। अगर प्रत्येक देश प्रगति के लिए सभी लोगों को साथ लेकर चल रहा है तो फिर भारत क्यों नहीं..?

मयूरवन जो आज है मुरैना

मयूरवन जो आज है मुरैना

राजवंश आते और नष्ट हो जाते । ब्रज का ये क्षेत्र बसता उजड़ता रहा परंतु कृष्ण ने इस क्षेत्र का जो सामरिक महत्व स्थापित किया वह  कम नहीं हुआ ।

इसी कारण 'गोपांचल पर्वत'  साक्षी रहा मौर्यों से गुप्तों तक की सेनाओं के स्कंधावारों   का और उनके सैनिक अभियानों का ।

शायद इसीलिये अशोक ने अपने राज्यादेश अंकित करवाये एक और  स्तम्भलेख में और रोपा था दतिया के पास गुर्जरा गांव में ।

गुप्तों ने तो खैर इस क्षेत्र को द्वितीय राजधानी का ही दर्जा दिया और अपने इस राजधानी क्षेत्र को नाम दिया "द्वितीया" जिसे आज कहा जाता है "दतिया" , हालांकि बुन्देलकाल में इसने पाया था एक और नाम "दिलीपनगर" परंतु प्राचीन नाम लोकमानस से ना निकल सका।

केवल सैन्य दृष्टि से ही नहीं मौर्यों और गुप्तों के सांस्कृतिक वैभव विशेषतः स्थापत्य का भी केंद्र रहा यह क्षेत्र ।

मौर्यकालीन ,कुषाणकालीन,हूणकालीन,गुर्जरकालीन मौर्योत्तरकालीन और गुप्तकालीन मूर्तियों की प्रचुरता बताती है कि कैसे कैसे  स्थापत्य के अनुपम प्रतिमान उन्होंने स्थापित किये होंगे जो समय की धारा में विलीन हुये या अभी भी धरती की गोद में छुपे हमसे आंख मिचौली खेल रहे हैं ।  कौन जाने ?

गुप्तों को हराकर गुर्जरों के हूण वंश ने ग्वालियर को दूसरी राजधानी बनाया।मुख्य राजधानी हूण वंश की स्यालकोट थी।हूणों के पराक्रम की यह धरती साक्षी बनी।ऐरन में गुर्जर सम्राट तोरमाण हूण ने मंदिर व मूर्ति का निर्माण कराया।

हूणों के बाद गुर्जरों की दूसरी शाखा जोकि हूणों की ही संतान थी यानि गुर्जर प्रतिहार।गुर्जरों की यह वंशवृक्ष उज्जैन की थी। भारत भूमि की प्रतिहारी यानि रक्षा करने के कारण गुर्जर प्रतिहार कहलाये और साथ ही गुर्जरी बोली में बड़गूजर यानि बड़े गुजर कहलायें।

गुर्जरों के महान शासक सम्राट तोरमाण हूण, सम्राट मिहिरकुल हूण, सम्राट नागभट द्वितीय, सम्राट मिहिरभोज, सम्राट महिपाल आदि शासकों ने यहाँ शासन किया।
बाद में यह भूमि गुर्जराघार भी कहलायी।यहाँ गुर्जर बहुलता भी है।

वीरता और शौर्य के साथ धार्मिक चेतना मुखरित हो उठी । गोजरी के मधुर गीतों  के साथ साथ 'बम बम भोले व जय गुर्जरेश्वर,जय मिहिर ' की हुंकार भी गुंजित हो उठी इस क्षेत्र की हवाओं में।

हम तो अपने महान पूर्वजो के साथ एक हाथ में #खांडा और एक हाथ में रोटी थामे खड़े थे भारत के द्वार पर ताकि खेतों में हलधर निर्विघ्न अपना हल चला सकें , ब्राह्मण यज्ञशालाओं में अपने यज्ञ निर्विघ्न पूरा कर सकें और भारत की श्रद्धा  विश्वकर्मा के पुत्रों द्वारा पत्थरों पर अंकित हो सके , मंदिरों के रूप में जो बिखरे पड़े हैं इस अंचल में ।

ऐसा ही एक स्मारक है गोपाद्री पर्वत पर ।

इस्लामिक आंधी को रोककर उसे सिंध तक धकेलने वाले  वीर गुर्जर सम्राटों का विजयप्रतीक और  उत्तरी भरतखंड में द्रविड़ शैली का एकमात्र मंदिर तैलंग मंदिर जो अब पुकारा जाता है , ' तेली का मंदिर ' जो मेरे वीर पूर्वजों के विजयस्तम्भ को निहारता रहा है अब तक । अपने राष्ट्र रक्षा कर्म के कारण गुर्जर राष्ट्र रक्षक कहलाये।

  लौटते हैं अपने मयूरवन , अपने मुरैना की ओर जहां हमारे गुर्जर पुरखों ने दिये गुर्जर स्थापत्य के अद्भुत उपहार जिसके गौरवान्वित प्रतिमान आज भी धैर्य से अपने सौंदर्य विज्ञापन और स्थापत्य प्रेमी गुणग्राहकों का इंतजार सा करते प्रतीत होते हैं ।ये कला मरू गुर्जर स्थापत्य कला शैली कहलायी।

इनमें से एक है पड़ावली स्थित मंदिर समूह जो अपने देवता भूतेश्वर शिव के नाम पर कहलाता है #बटेसर ।

शिव को समर्पित इन मंदिरों की लघुता भरी सादगी देखते ही बनती है । पर एक ही स्थान पर 200 मंदिरों का निर्माण ? कीर्तिलाभ या श्रद्धा ?? कैसे बताया जाये ???

समयचक्र घूमा । भारत के द्वाररक्षक गुर्जर प्रतिहारों का सूर्य अस्ताचल की ओर ढला और तब गजनवी के विरुद्ध कायरता दिखाकर अपने यशस्वी पूर्वजों की कीर्ति पर कालिख लगाने वाले गुर्जर राज्यपाल प्रतिहार को दंडित कर  गुर्जरों का अन्य वंश चंदेल वंश काबिज़ हुआ।
इसके बाद ही बारहवीं सदी के बाद गुर्जरों के कई वंश खुद को राजपूत कहने लगे और राजपूत एक वर्ग की तरह उभरने लगा जो सल्तनत कल में विभिन्न बिरादरियों से मिलकर राजपूत वर्ग की तरह पनपा।

यहीं पर गुर्जर शासकों का बनाया मंदिर है चौसठ योगिनी मंदिर। इसी मंदिर को देखकर ही #लुटियन ने नई दिल्ली में रचा विधानभवन का वह स्थापत्य जो आगे चलकर बना भारत के संसदभवन के रूप में भारत की संप्रभुता का प्रतीक ।

शैव तंत्र और तांत्रिकों का यह गढ़ भारतीय स्थापत्य के वैभिन्य को तो प्रदर्शित करता है पर  न जाने क्यों इसका अवलोकन करने पर एक डरावनी प्रतीति होती है मानो यह ब्रह्मांड में हमारे एकाकीपन का प्रतीक हो । या शायद तंत्र और तांत्रिकों से संबंधित होने के कारण इससे ऐसा पूर्वाग्रह जुड़ गया हो ।

जो भी हो यह क्षेत्र का गौरव है जिसने भारतीय लोकतंत्र के भौतिक प्रतीक को उकेरने में अपना योगदान दिया और जो खड़ा है एक और अद्भुत समानता के साथ कि स्थापत्य के इस अद्भुत प्रतीक में होती थी|

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

दिल्ली का तोमर, तंवर राजघराना गुर्जरवंशी है

गुर्जर राजा अंनगपाल तंवर/तोमर

गुर्जर अंनगपाल तोमर (शुद्ध: अनङ्पाल) राजवंश का राजा था, जो 11वीं शताब्दी ई. के मध्य हुआ। उसने दिल्ली में उस स्थान पर क़िले का निर्माण करवाया, जहाँ इस समय क़ुतुबमीनार स्थित है। राजा अनंगपाल ने ही दिल्ली नगर को राजधानी के रूप में स्थायित्व प्रदान किया था। राजा जयचंद, जिसकी पुत्री राजकुमारी संयोगिता के साथ पृथ्वीराज चौहान ने विवाह किया, अनंगपाल का नातीन था।

प्रसिद्ध 'लौह स्तम्भ', जिस पर चन्द्र नामक अपरिचित राजा की प्रशस्ति अंकित है, 1052 ई. में अनंगपाल गुर्जर द्वारा हटाकर वर्तमान स्थान पर लाया गया था।
अनंगपाल द्वारा यह लोह स्तम्भ बाद में मन्दिरों के बीच में खड़ा कर दिया गया।
दिल्ली नगर की स्थापना के सन्दर्भ में कई कथाएँ प्रचलित हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि गुर्जर तोमर वंश के अनंगपाल ने ही 11वीं शताब्दी में इसकी स्थापना की थी।
कुछ पुस्तकों में वर्णित है कि तोमर गुर्जरों के सरदार अनंगपाल ने 737 ई. में 'दिल्ली का गाँव' में 'लालकोट' नामक नगर बसाकर राजधानी स्थापित की थी।
बाद के समय में लालकोट पृथ्वीराज चौहान के पश्चात् 'क़िला राय पिथोरा' कहलाया।
अनंगपाल की दो कन्याएँ थीं- सुंदरी और कमला।
सुंदरी का विवाह कन्नौज के राजा विजयपाल के साथ हुआ और इस संयोग से राठौर राजा जयचंद की उत्पत्ति हुई।
दूसरी कन्या कमला का विवाह अजमेर के चौहान राजा सोमेश्वर के साथ हुआ, जिनके पुत्र पृथ्वीराज हुए।
अनंगपाल ने अपने नाती पृथ्वीराज को गोद ले लिया, जिससे अजमेर और दिल्ली का राज एक हो गया |

नोट - आज भी दिल्ली में तंवर गोत्र सिर्फ गुर्जरों मे पाया जाता हैं, 
व दिल्ली के दक्षिणी भाग में 12 गांव तंवर गोत्र के गुर्जरों के हैं, व दिल्ली के भाट इन्हें  गुर्जर अंनगपाल राजा की संतान बताते हैं|