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रविवार, 14 जनवरी 2018

राष्ट्रीय गुर्जर नेता चौधरी नेपाल सिंह कसाना ने अपना दल (एस) का दामन क्यों थामा, पढ़िए पूरी कहानी

#मैने_अपना_दल_एस_क्यूँ_ज्वाइन_किया
पिछले कई दिनों से तमाम साथी ओर शुभचिंतक लगातार ये प्रश्न कर रहे है कि हमने अपना दल(एस) को क्यों चुना??आखिर कैसे अपना दल(एस) के झंङे के नीचे पिछङो दलितो वंचितों शोषित किसान कमेरो का हित ओर राजनैतिक अस्तित्व मजबूत होगा???
इन सभी सवालों ओर जिज्ञासाओं को मै दूर करने के लिए आप लोगों के बीच हूँ।
सबसे पहले तो मै आपको अपनी सामाजिक ओर राजनैतिक पृष्ठभूमि से अवगत कराता चलता हूँ।मुझे 30 वर्ष का समाजिक एवं राजनैतिक अनुभव है। मैं  M.Sc. BEd हूँ, आयु 59 वर्ष है। सारे देश का भ्रमण कर चुका हूँ। गूर्जर समाज की विभिन्न गतिविधियों से 1975 से जुड़ा हूँ। कोई भी गुर्जर बाहुल्य क्षेत्र पुरें देश मे ऐसा नहीं है जिससे मैं परिचित नहीं हूँ। 7 राज्यों मे गुर्जर बाहुल क्षेत्रों मे हमारे परिवार काफ आर्थिक योगदान रहा है।मेरा पुरा परिवार भाई बहन बेटा बेटी सभी उच्च शिक्षित है ओर पुरे देश के विभिन्न प्रदेशो पिछले 35 साल से लगातार हमारी कंपनी के निर्माण कार्य संचालित है।शिक्षा के क्षेत्र मे विशेष कार्य करके पुरे देश मे विशेष ख्याति अर्जित की है।सामाजिक कार्य करने के कारण हर वर्गके लोगो का प्यार दुलार ओर सम्मान प्राप्त किया है।सर्वसमाज ने हमेशा से हमे ओर हमारे प्यार को सम्मान ओर प्यार से नवाजा है। कवि एवं पत्रकार होने के कारण देश विदेश के इतिहास का काफी अधययन किया हैं।ओर यूरोप के कई देशो का भ्रमण अब से 20 साल पूर्व कर चुका हूँ।अखिल भारतीय गुर्जर महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद पर वर्तमान मे कार्यरत रहकर समाज के कार्यो से जुङा हुआ हूँ। 2002 मे विधान परिषद स्नातक चुनाव मैने समाजवादी पार्टी से लङा ओर उपविजेता रहा।
14 वर्ष महान किसान नेता श्री राजेश पायलट के साथ तथा 15 वर्ष समाजवादी पार्टी मे रहकर यह अनुभव प्राप्त किया कि किसी भी जाति का महत्व उसकी संख्या, सगठन, एकता एवं उस जाति का अपने किसी लीडर को राजनीति के उच्च शिखर पर पहुचाने का जुनून होता हैं।
इतिहास के पन्नों को पढकर मैं इस निर्णय पर पहुंचा कि महान गुर्जर सम्राट कुषाण वंश (सन् 25 से 395) ,गूर्जर हूण सम्राट (सन 440से 495),  कन्नौज के महान प्रतापी गूर्जर प्रतिहार सम्राटों(सन525 से 1090) ने इस देश पर हजारों साल तक राज्य किया। 300 वर्षों तक अरबों के आक्रमण से गुर्जर प्रतिहार सम्राटों ने इस भारतीय संस्कृति को इस्लाम धर्म में परिवर्तित होने से बचाया। 1019 में महमुद ग़ज़नवी के आक्रमण से गुर्जर प्रतिहार वंश का उत्तर प्रदेश की कन्नौज राजधानी से शासन का  पतन के बाद -गुर्जर जाति की शौर्य गाथा खत्म हो गयी। परिणाम स्वरुप गुर्जर जाति के मूल से - 36 वंश राजपूत के, 70%कुर्मी, 80%पाटीदार ,60% मराठा की अनेको उप जातियों का उद्भव  हुआ। शेष गुर्जर क्षत्रिय 1090 से 1947 तक  निरन्तर सत्ता से टकराता रहा।परिणाम,अशिक्षा, विद्रोही स्वभाव, आर्थिक क्षति, सत्ता से दूर होना।
देश धर्म ओर राष्ट्र के लिए इतना बङा अदम्य साहस दिखाने के बाद भी महान गुर्जर सम्राट मिहिरभोज को देश के सत्ताधारी लोगों ओर सरकारो द्वारा इतिहास मे अनदेखा कर दिया गया। यहां तक कि महान प्रतापी सम्राट शिवाजी का राजतिलक तत्कालीन पुजारियों द्वारा पैर से अंगुठे से किया। आजाद भारत मे सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनने से रोका गया।वर्तमान मे उत्तर प्रदेश मे सरकार मे किसी गुर्जर को मंत्री मंङल का हिस्सा नहीं बनाया गया।गुजरात मे 88 पटेल विधायक सदन मे होने के बाद भी किसी पटेल को मुख्यमंत्री बनाये जाने लायक नही समझा गया। वर्तमान मे किसी गुर्जर कुर्मी या पटेल समुदाय के व्यक्ति को केन्द्रीय मंत्रीमंङल मे कैबिनेट स्तर का पद नही दिया गया।चाहे कभी वो राजेश पायलट रहे हो या संतोष गंगवार हो या फिर सचिन पायलट हो।
आज उत्तर प्रदेश, दिल्ली,उत्तराखंड, हरियाणा,पंजाब,हिमाचल, जम्मू कश्मीर, राजस्थान, मध्यप्रदेश,गुजरात एवं माहाराष्ट का हिन्दू मुस्लिम सिक्ख गुर्जर समाज आर्थिक एव शिक्षा के क्षेत्र मे बहुत आगे बढ गया है। अपनी खो हुई प्रतिष्ठा पुनः पाने के लिये उठ खड़ा हुआ है। राजस्थान  मे गूर्जर आरक्षण की माँग, गुजरात मे पाटीदार आरक्षण की माँग, महाराष्ठ मे मराठा आरक्षण की माँग पुरे देश मे गुजं रही है। लेकिन इतना सब होने के बाद भी हमारी मांगे नजरअंदाज की गई है ओर वो राजनैतिक हक हम लोगो को नही मिल पाया जिसके हम अधिकारी है।राजस्थान मे 72 कुर्बानियो के बाद भी, गुजरात मे 14 पाटिदारो की हत्या मंदसौर मे 8 पाटिदार किसानों की हत्या के बाद भी आखिर हमे क्या मिला?? हमारे संघर्ष ओर बलिदान का परिणाम क्या हुआ?? हम वहीं खङे रह गये जहा खङे थे।इसका कारण था हमारी आवाज ओर संघर्ष का एकजुट रूप ना होना, हमारा विखंङित होना।
आजादी के आज़ादी के बाद भी एक विशेष वर्ग के लोग राजनैतिक सत्ता पर काबिज है ओर दलित पिछङे गरीबो का सिर्फ शोषण ओर इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए इन लोगो द्वारा किया गया।
ये वही लोग है जिन्होने बाबा साहब अंबेडकर को चुनाव जीतने नही दिया।ओर समाज ओर देश को जातिगत रूप से बाँट कर रखा।
जो क्षत्रिय कभी सम्राट हुआ करते थे उनकी संतानों को इन लोगों ने पिछङे ओर अनुसूचित जाति के स्तर तक पहुंचा दिया।
पिछङो के आरक्षण की मांग जो नेहरू के समय से ही उठती आ रही है।उसको हमेशा दबाने का काम किया गया।जनता दल की सरकार के दौरान पूर्व प्रधान मंत्री चौधरी चरण सिंह के कार्यकाल के दौरान मंङल आयोग का गठन हुआ मगर कांग्रेस की सरकार ने उस रिपोर्ट को दबाया रखा। पुनः जनता दल की सरकार बनने पर बेहद ईमानदार उच्च शिक्षित महान व्यक्तितव के धनी वीपी सिंह के प्रधानमंत्री बनने पर मंङल आयोग की रिपोर्ट को लागू किया ओर उच्च श्रेणी के लोगों के विरोध को विरोध को दरकिनार कर दिया।
ये उच्च श्रेणी के लोग आज भी देश की न्याय व्यवस्था राज व्यवस्था ओर प्रशासनिक व्यवस्था पर काबिज है ओर दलितो पिछङो के हक को दबाये बैठे है।
आरक्षित वर्ग के लोगों के अधिकारों का हनन हो रहा है मगर फिर भी वो लोग जै कभी आरक्षण के हिमायती रहे है चुप है क्योंकि उनके अपने व्यक्तिगत राजनैतिक स्वार्थ है।ओर वो आरक्षित वर्ग के लोगो के हक मे बोलने पर खुद को असुरक्षित महसूस करते है।
देश की अर्थव्यवस्था ओर निजी क्षेत्रो मे उच्च वर्ग के लोग बहुतायत मे है।ओर ये 15% लोग देश के 50% संसाधनो उपयोग करते हुए 85% लोगों के अधिकारों का दोहन कर रहे है।
इसलिए आज आवश्यकता है इस पिछङे दलित वंचित शोषित वर्ग के लोगो की हको की लङाई को संगठित होकर लङा जाए। जिस तरह मौर्य,कुशवाह,सैनी,शाक्य उपजातियो का एक साथ आने से उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य मे सत्ता मे अपनी भागीदारी प्राप्त कर ली है। उसी तरह गूर्जर,कुर्मी, पाटीदार, मराठा को भी एक झण्डे के नीचे  आना होगा।
झण्डा अपना दल (एस )  पार्टी का मौजूद है।अपना दल(एस) के वर्तमान मे उत्तर प्रदेश मे 9 विधायक है और 2 सांसद है।उत्तर प्रदेश सरकार मे कारागार मंत्री अपना दल से है तो खुद 35 वर्षीय माननीय अनुप्रिया पटेल जी केन्द्रीय सरकार मे मंत्रीमंङल मे शामिल है।
शानदार व्यक्तित्व की धनी उच्च शिक्षित, प्रखर वक्ता, युवानेत्री , श्रीमती अनुप्रिया पेटल केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री एवं राष्ट्रीय संयोजिका अपना दल (एस)सम्पूर्ण राष्ट्र के  दबे ,कुचले,पिछड़े, किसान एवं कमेरौ की आवाज उठाने के लिये तैयार है। उनका कहना है कि-सत्ता और पद सुख भोगने के लिये नहीं है। यह तो दबे, मपिछड़े, कमेरो एवं गरीबों के कल्याण और उनकी सेवा के लिए होती है। इसीलिए मैंने उसी पीड़ा के साथ अपने इतिहास की सभी अपनी मूल जातियों की एक एकता तथा सत्ता केउच्च शिखर पर देखने के लिए अपने रक्त संबंधी पार्टी का दामन थामा है। आजाद देश के महान नेता, भारत रत्न लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल के एक ही वंशज  होने के कारण हम पूरी ताकत झोंककर अपनी नेता श्रीमती अनुप्रिया पटेल को महान नेत्री बना सकते हैं।हम सभी को विशेषकर युवाओं को गैर इनंसाफी के खिलाफ एक आवाज  बनकर हमें घर से निकलकर सड़कों पर आना होगा तथा देश के सभी जाति ,धर्म के लोगो को प्रेम व सम्मान के साथ अपने झण्डे के नीचे लाना होगा। मेरी प्रतिज्ञा, निष्ठा और तन ,मन, धन ताउम्र उनके साथ रहेगा।
अगर हम लोग संगठित हो जाए तो एक बङी राजनैतिक ताकत देश मे बन सकते है।गुर्जर कुर्मी पटेल पाटीदार मराठा आज देश मे 27 करोङ है।जो खुद मे एक बहुत बङी  राजनैतिक ताकत है।
जय मिहिरभोज।। जय शिवाजी।।जय सरदार।।
जय गुर्जर।।जय कुर्मी।।जय पाटीदार।।जय मराठा।।

चौधरी नेपाल सिंह कसाना
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष/पश्चिमी उप्र प्रभारी/राजस्थान प्रभारी
अपना दल (एस)

सोमवार, 8 जनवरी 2018

गुर्जरों को आरक्षण नहीं तो भाजपा को वोट नहीं : धीरज गुर्जर


गुर्जरों को आरक्षण नहीं तो भाजपा को वोट नहीं : धीरज गुर्जर

(मांडलगढ़/ दिनांक 08 जनवरी 2018)
 
अखिल भारतीय युवा गुर्जर महासभा राजस्थान के प्रदेश महासचिव धीरज गुर्जर ने कहा कि भाजपा सरकार ने गुर्जर आरक्षण के मामले में कमजोर पैरवी करने की वजह से गुर्जर आरक्षण न्यायालय में अटका| 2013 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में गुर्जर, रेबारी, बंजारा, गाड़िया लोहार, गाडरी जातियों को विशेष पिछड़ा वर्ग में 5% आरक्षण देने का वादा किया था लेकिन भाजपा सरकार की कमजोर पैरवी के कारण पांचो जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिला इसकी जिम्मेदार वर्तमान भाजपा सरकार है| गुर्जर समाज 5% आरक्षण के लिए हर संघर्ष को तैयार है और आंदोलन की रूपरेखा बनाई जा रही है| गुर्जर समाज 50 प्रतिशत सीमा के दायरे में 5 प्रतिशत आरक्षण लेकर रहेगा चाहे बलिदान होना पड़े| बहुत जल्द ही 5% गुर्जर आरक्षण को लेकर मांडलगढ़ में गुर्जर महापंचायत का आयोजन किया जायेगा जिसमें देशभर के गुर्जर नेता भाग लेंगे| पूर्व में हुई सभी भर्तियों में समझौते के मुताबिक एसबीसी का 5% बेकलॉग भरा जावे और गुर्जर सहित पांचों जातियों को 5% आरक्षण 50% सीमा के दायरे में लागू किया जावे, अगर सरकार ने समय रहते गुर्जर आरक्षण लागू नहीं किया तो मांडलगढ़ विधानसभा के उपचुनाव में गुर्जर समाज भाजपा का बहिष्कार करेगा|

                 धीरज गुर्जर
               प्रदेश महासचिव
अखिल  भारतीय युवा गुर्जर महासभा राजस्थान

मंगलवार, 2 जनवरी 2018

इतिहास का सबसे बड़ा खुलासा, राणा प्रताप गुर्जर वंश के थे

कुछ प्रमाण यहाँ दिये जा रहे हैं जो स्पष्टत: राणा प्रताप के वंश के बारे मे यह दर्शाते हैं कि वे गुर्जर वंश से थे।
     महाराणा प्रताप आर्यावर्त के महान सूर्यवंशी चक्रवर्ती सम्राटों के वारिस थे। उनका गुहिलोत वंश छठी शताब्दी में गुर्जर साम्राज्य के सूर्यवंशी सम्राट गुहिल (गुहदत्त) से प्रारम्भ हुआ था, जो राजस्थान सहित दक्षिण में मालवा व नर्मदा नदी तक फैला हुआ था। यहाँ के शासक प्रारम्भ से ही पश्चिम की ओर से होने वाले विदेशी हमलावरों से भारत भूमि की रक्षा करते रहे थे। इसी वंश मे पैदा हुए बप्पा रावल (कालभोज) ने इरानी और अरबी यवन आक्रान्ताओं के इस्लामी साम्राज्यवाद से संघर्ष कर हिन्दु धर्म, संस्कृति और राष्ट्र की रक्षा की थी। इन्हीं के पुत्र रावल खुमाण प्रताप को 'खुमाण' भी कहा जाता हैं। इसी वंश मे महाराणा हम्मीर, महाराणा लाखा, पितृभक्त महाराणा चूण्डा, महाराणा कुम्भा जैसे वीर शिरोमणी, उदार और महापराक्रमी शासक हुये थे, जिन्होनें हिन्दु राष्ट्र की अस्मिता और अखण्डता के लिये विदेशी आक्रान्ताओं से लगातार संघर्ष किया। वे देश की स्वतंत्रता के आदेश पुजारी थे।
(पाथेय कण, जून(प्रथम) 1996 पृष्ठ संख्या 7 कालम 1)

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

जमींदार के साथ साथ उत्पादक भी बनो

जमीन है तो जमींदार हो,नंबरदार हो, चौधरी हो, प्रधान हो,मुकददम हो,गुर्जर हो ।अगर जमीन गयी तो सडक पर आ जाओगे क्योंकि सदियो की झंझावतो में हम अपनी संस्कृति व जमीन ही बचा पाये । जमीन का बचना बेहद जरूरी है। हम किसान हैं , जमींदार हैं तो जमीन खरीदो , ज्यादा से ज्यादा जमीन बढाओ। दिल्ली व एनसीआर के गुर्जरो को खासकर सलाह है कि दूसरे दूर दराज के राज्यो में ज़मीनें खरीदो । मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ,झारखंड , महाराष्ट्र,उत्तराखंड , हिमाचल,गुजरात हर राज्य में जमीन खरीदो। फिर उस जमीन पर पेशेवर खेती करो , सेब के बागान,अंगूरो के बागान ताकि वाइन का बिजनेस कर सको , पोलीग्रीन खेती करो ,ड्रिप सिस्टम फार्मिंग करो , डेयरी फार्म खोलो ,दूध का बडा बिजनेस करो ,केवल दूध का ही नहीं बल्कि पनीर, आइसक्रीम ,मक्खन हर तरह का दूध का उत्पाद खुद बनाओ क्यों दूसरो को मुनाफा कमवा रहे हो। आम के बगीचे लगा लो ,घर बैठे लाभ लो व जमींदार बने रहो ,एक्सप्लोर करो व बिजनेस करो, पेशेवर बनो , जमींदार बनो व साथ ही उत्पादक भी।
मानो बात को अपने इस पैसे को फिजूलखर्ची के बजाय दूसरे राज्यो में जाकर नाम कमाओ ताकि गूजरान का नाम गूंजे। सैकडो बीघे खेत खरीदकर उस पर पेशेवर खेती करो । लोग जानें कि हाँ भाई गूजरन का जमींदारा है ये । एजेंसी लो ,हर तरह का पेशा आधुनिक नजरिये से अपनाओ

source facebook.com/gcs.du

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

गुर्जरों की आरक्षण रैली एवं सभा 25 को मांडलगढ़ में

गुर्जर समाज के आरक्षण एवं मान, सम्मान और स्वाभिमान के लिए 25 तारीख को मांडलगढ़ चलो- मांडलगढ़ चलो*
समस्त गुर्जर समाज से हाथ जोड़कर करबद्ध निवेदन है कि 25 दिसम्बर को मांडलगढ़ उपखण्ड स्तर पर गुर्जर समाज की जिला स्तरीय विशाल गुर्जर आरक्षण रैली एवं गुर्जर आरक्षण आमसभा का आयोजन मांडलगढ़ में किया जा रहा है, अतः आप सभी गुर्जर भाई अधिक से अधिक संख्या में पधारकर गुर्जर समाज के आरक्षण सहित मूलभूत अधिकारों के आंदोलन में भाग लेकर कार्यक्रम को सफल बनायें|  गुर्जर समाज के मान, सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अधिक से अधिक संख्या में 25 दिसम्बर को मांडलगढ़ पधारे|
*निवेदक*
*समस्त गुर्जर समाज मांडलगढ़*

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

गुर्जर-प्रतिहार वंश के महान हिन्दू धर्म रक्षक सम्राट मिहिर भोज की कहानी


मिहिर का अर्थ सूर्य होता है और सच्चे अर्थों में सम्राट मिहिर भोज भारत में अपने समय के सूर्य थें।उत्तर भारत में प्रसिद्ध एक लोकोक्ति उनकी विरासत को चरितार्थ करती है,लोकोक्ति है “कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली”।एक महान योद्धा,कुशल घुड़सवार होने के साथ उन्हें विद्वानों ने उनकी विद्वता के लिए “कविराज” की उपाधि भी दी थी।गुर्जर-प्रतिहार के मुलपुरुष प्रभु श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण को माना जाता है।इस हिसाब से आज के उत्तर भारत में पाये जाने वाली गुर्जर जाति का सम्बन्ध क्षत्रिय कूल से है,उनके वंश की लगभग 500 वर्ष की शाषण काल भी इस बात की घोतक है।नागभट्ट प्रथम से लेकर गुर्जर-प्रतिहार के अंतिम शाषक तक अरब आक्रमणकारियों से लड़ते रहें लेकिन उनमे लगातार 50 वर्षों तक युद्ध में अरबों के छक्के छुड़ाने वाले मिहिर भोज की कहानी बेमिशाल और अद्वितीय है। ईस्वी सन् (712-1192) के बिच लगभग 500 वर्षों तक गुर्जर-प्रतिहार वंश ने अनेक युद्ध में बाहरी आक्रमणकारियों को हराया।उनके कमजोर होने के बाद ही महमूद गजनवी और मुहम्मद गोरी ने भारत के तरफ मुहीम की शुरुआत की।आज भारत की सनातन संस्कृति के वे सबसे बड़े ध्वज वाहक हैं।कुछ देर पढ़िए आपको सब समझ आ जाएगा की कैसे?

मिहिर भोज का साम्राज्य पश्चिम में सिंधु नदी से पूरब में बंगाल तक तथा उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी तक फैला हुआ अत्यन्त विशाल और समृद्ध क्षेत्र था।

मिहिर भोज विष्णु और शिव भगवान के भक्त थे तथा कुछ सिक्कों मे इन्हे ‘आदिवराह’ भी माना गया है।वराह(जंगली सूअर) के उपाधि के पीछे की कहानी यह है की जिस तरह से भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष से इस भूमि का रक्षा किया था उसी तरह इस भूमि की रक्षा मिहिर भोज ने की थी। महरौली नामक जगह इनके नाम पर रखी गयी थी तथा राष्ट्रीय राजमार्ग 24 का बड़ा भाग सम्राट मिहिरभोज मार्ग के नाम से जाना जाता है।

गुर्जर सम्राट मिहिर भोज का शाषण काल 836 ईसवीं से 885 ईसवीं तक माना जाता है।यानी लगभग 50 वर्ष।सम्राट भोज के साम्राज्य को तब गुर्जर देश के नाम से जाना जाता था।

प्रसिद्द अरब यात्री सुलेमान ने भारत भ्रमण के दौरान लिखी पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं में सम्राट मिहिर भोज को इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु बताया है , साथ ही मिहिर भोज की महान सेना की तारीफ भी की है।जो इनकी हिन्दू धर्म की रक्षा में इनकी भूमिका बताने के लिए काफी है।

915 ईस्वीं में भारत आए बगदाद के इतिहासकार अल- मसूदी ने अपनी किताब मरूजुल महान मेें भी मिहिर भोज की 8 लाख पैदल सैनिक और हज़ारों हाथी और हज़ारों घोड़ों से सज्जी इनके पराक्रमी सेना के बारे में लिखा है।इनकी राजशाही का निशान दांत निकाले चिंघाड़ता हुआ “वराह”(जंगली सूअर) था और ऐसा कहा जाता है की मुस्लिम आक्रमणकारियों के मन में इतनी भय थी कि वे वराह यानि जंगली सूअर से नफरत करने लगे थें। मिहिर भोज की सेना में सभी वर्ग एवं जातियों के लोगो ने राष्ट्र की रक्षा के लिए हथियार उठाये और इस्लामिक आक्रान्ताओं से लड़ाईयाँ लड़ी।

सम्राट मिहिर भोज के उस समय स्थानीय शत्रुओं में बंगाल के पालवंशी
और दक्षिण का राष्ट्रकूट(यादव कूल) थें,इसके अलावे बाहरी शत्रुओं में अरब के खलीफा मौतसिम वासिक, मुत्वक्कल, मुन्तशिर, मौतमिदादी थे । अरब के खलीफा ने इमरान बिन मूसा को सिन्ध के उस इलाके पर शासक नियुक्त किया था। जिस पर अरबों का अधिकार रह गया था। सम्राट मिहिर भोज ने बंगाल के राजा देवपाल के पुत्र नारायणलाल को युद्ध में परास्त करके उत्तरी बंगाल को अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया था। दक्षिण के राष्ट्र कूट राजा अमोधवर्ष को पराजित करके उनके क्षेत्र अपने साम्राज्य में मिला लिये थे । सिन्ध के अरब शासक इमरान बिन मूसा को पूरी तरह पराजित करके समस्त सिन्ध को गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य का अभिन्न अंग बना लिया था। केवल मंसूरा और मुलतान दो स्थान अरबों के पास सिन्ध में इसलिए रह गए थे कि अरबों ने गुर्जर सम्राट के तूफानी भयंकर आक्रमणों से बचने के लिए अनमहफूज नामक गुफाए बनवाई हुई थी जिनमें छिप कर अरब अपनी जान बचाते थे।सम्राट मिहिर भोज नहीं चाहते थे कि अरब इन दो स्थानों पर भी सुरक्षित रहें और आगे संकट का कारण बने इसलिए उन्होंने कई बड़े सैनिक अभियान भेज कर इमरान बिन मूसा के अनमहफूज नामक जगह को जीत कर गुर्जर साम्राज्य की पश्चिमी सीमाएं सिन्ध नदी से सैंकड़ों मील पश्चिम तक पंहुचा दी और इस प्रकार भारत देश को अगली शताब्दियों तक अरबों के बर्बर, धर्मान्ध तथा अत्याचारी आक्रमणों से सुरक्षित कर दिया था।

साहस,शौर्य,पराक्रम वीरता और संस्कृति के रक्षक सम्राट मिहिर भोज जीवन के अंतिम वर्षों में 50 वर्ष तक राज्य करने के पश्चात हिन्दू धर्म के सन्यास परम्परा के अनुसार अपने बेटे महेंद्र पाल को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे।

किसी कवि ने उनके बारे में निम्न पंक्तियाँ लिखी है।

“दो तरफ समुद्र एक तरफ हिमालय,
चौथी ओर स्वयं वीर गुर्जर-प्रतिहार थें,
हर बार हर युध्द में अरबों का हराया,
प्रतिहार मिहिर भोज ऐसे प्रहार थें”

– लेखक – राजन भारद्वाज अग्निवीर

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

गुर्जर प्रतीक चिन्ह - गुर्जर सम्राट कनिष्क का शाही निशान

गुर्जर प्रतीक चिन्ह - सम्राट कनिष्क का शाही निशान

Gurjar / Gujjar Logo- The Royal Insignia of Kanishka

डॉ सुशील भाटी

सम्राट कनिष्क के सिक्के पर उत्कीर्ण पाया जाने वाला ‘राजसी चिन्ह’ को ‘कनिष्क का तमगा’ भी कहते हैं| कनिष्क के तमगे में ऊपर की तरफ चार नुकीले काटे के आकार की रेखाए हैं तथा नीचे एक खुला हुआ गोला हैं| कनिष्क का राजसी निशान “शिव के त्रिशूल” और उनकी की सवारी “नंदी बैल के पैर के निशान” का समन्वित रूप हैं| सबसे पहले इस राज चिन्ह को कनिष्क के पिता सम्राट विम कड्फिस ने अपने सिक्को पर उत्कीर्ण कराया था| विम कड्फिस शिव का परम भक्त था तथा उसने माहेश्वर की उपाधि धारण की थी| यह राजसी चिन्ह कुषाण राजवंश और राजा दोनों का प्रतीक था तथा राजकार्य में मोहर के रूप में प्रयोग किया जाता था| 

मशहूर पुरात्वेत्ता एलेग्जेंडर कनिंघम इतिहास प्रसिद्ध कुषाणों की पहचान आधुनिक गुर्जरों से की हैं| उनके अनुसार गुर्जरों का कसाना गोत्र कुषाणों का वर्तमान प्रतिनिधि हैं|

सम्राट कनिष्क का ‘राजसी चिन्ह’ गुर्जर कौम की एकता, उसके गौरवशाली इतिहास और विरासत का प्रतीक हैं| ऐतिहासिक तौर पर कनिष्क द्वारा स्थापित कुषाण साम्राज्य गुर्जर समुदाय का प्रतिनिधित्व करता हैं, क्योकि यह मध्य और दक्षिण एशिया के उन सभी देशो में फैला हुआ था, ज़हाँ आज गुर्जर निवास करते हैं| कुषाण साम्राज्य के अतरिक्त गुर्जरों से सम्बंधित कोई अन्य साम्राज्य नहीं हैं, जोकि पूरे दक्षिणी एशिया में फैले गुर्जर समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए अधिक उपयुक्त हो| यहाँ तक की मिहिर भोज द्वारा स्थापित प्रतिहार साम्राज्य केवल उत्तर भारत तक सीमित था, तथा पश्चिमिओत्तर में करनाल इसकी बाहरी सीमा थी| 

कनिष्क के साम्राज्य का एक अंतराष्ट्रीय महत्व हैं, दुनिया भर के इतिहासकार इसमें अकादमिक रूचि रखते हैं|