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मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

गुर्जर समाज ने मनाई छत्रपति शिवाजी महाराज बैंसला की जयंती

गुर्जर समाज ने मनाई छत्रपति शिवाजी महाराज बैंसला की जयंती

बयाना। यहां भगवती कॉलोनी स्थित देवनारायण मंदिर पर अखिल भारतीय युवा गुर्जर महासभा के तत्वावधान में छत्रपति शिवाजी महाराज बैंसला की 388 वीं जयंती मनाई गई। महासभा के जिला अध्यक्ष भानू गुर्जर की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में महासभा के कार्यकर्ताओं ने छत्रपति शिवाजी महाराज बैंसला की प्रतिमा पर माल्यापर्ण कर उनकी जीवनी पर प्रकाश डाला व उनके पदचिन्हों पर चलने का आहवान किया। महासभा के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी सुरेन्द्र खटाना ने उनकी जीवनी पर प्रकाश डालते हुए बताया कि छत्रपति शिवाजी महाराज साहस, शौर्य और स्वाभिमान के प्रतीक थे। उन्होंने देश में स्वाधीनता की अलख जगाई। खटाना ने युवाओं से उनके जीवन से प्रेरणा लेकर उनके पदचिन्हों पर चलने का आहवान किया। इस दौरान प्रदेश उपाध्यक्ष हरेन्द्र सूपा, महासचिव पुरूषोत्तम फौजी, सँयुक्त सचिव गजेन्द्र बिधुड़ी, जिला उपाध्यक्ष धनीराम कसाना, तहसील अध्यक्ष मुकेश खटाना, राजेश बैंसला जहाज, नरेश गुर्जर, वासुदेव गुर्जर, सतवीर गुर्जर, हेमराज नागर, सुरेन्द्र सिंह, राधेश्याम गुर्जर, नरेश दमदमा, आकाश कसाना सहित कई कार्यकर्ता मौजूद रहे।

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

गुर्जर प्रतीक चिन्ह - सम्राट कनिष्क का शाही निशान [गुर्जर लोगो (Gujjar Logo) हैं ब्रह्मास्त्र (पाशुपतास्त्र) का प्रतीक]

गुर्जर प्रतीक चिन्ह - सम्राट कनिष्क का शाही निशान
[गुर्जर लोगो (Gujjar Logo) हैं  ब्रह्मास्त्र (पाशुपतास्त्र) का प्रतीक]

डॉ सुशील भाटी

सम्राट कनिष्क के सिक्को पर पाए जाने वाले शाही निशान को कनिष्क का तमगा भी कहते है| कनिष्क के तमगे में ऊपर की तरफ चार नुकीले काटे के आकार की रेखाए हैं तथा नीचे एक खुला हुआ गोला हैं इसलिए इसे चार शूल वाला ‘चतुर्शूल तमगा” भी कहते हैं| कनिष्क का ‘चतुर्शूल तमगा” सम्राट और उसके वंश / ‘कबीले’ का प्रतीक हैं| इसे राजकार्य में शाही मोहर के रूप में भी प्रयोग किया जाता था| कनिष्क के पिता विम कडफिस ने सबसे पहले ‘चतुर्शूल तमगा’ अपने सिक्को पर शाही निशान के रूप में प्रयोग किया था| विम कडफिस शिव का उपासक था तथा उसने माहेश्वर की उपाधि धारण की थी| माहेश्वर का अर्थ हैं- शिव भक्त

शैव चिन्ह पूर्व में भी तमगे के रूप में प्रयोग हो रहे थे|  नंदी बैल के पैर का निशान वाला ‘नन्दीपद तमगा’ शासको द्वारा पूर्व में भी  सिक्को पर प्रयोग किया गया था| इसलिए कुछ इतिहासकारों का मानना हैं कि चतुर्शूल तमगा शिव की सवारी ‘नंदी बैल के पैर के निशान’ और शिव के हथियार ‘त्रिशूल’ का ‘मिश्रण’ हैं| अतः विम कड्फिस और कनिष्क का तमगा एक शैव चिन्ह हैं|  तमगे का नीचे वाला भाग नंदीपद जैसा हैं, परन्तु इसमें त्रिशूल के तीन शूलो के स्थान पर चार शूल हैं?

त्रिशूल के अतिरिक्त, शिव के पास चार शूल वाला एक और परम शक्तिशाली अस्त्र हैं, जिसे पौराणिक साहित्य में पाशुपतास्त्र कहा गया हैं| मान्यता हैं कि शिव पाशुपतास्त्र से दैत्यों का संहार करते हैं तथा युग के अंत में इससे सृष्टी का विनाश करेंगे| पाशुपतास्त्र एक प्रकार का ब्रह्मशिर अस्त्र हैं| वस्तुतः ब्रह्मशिर अस्त्र एक प्रकार का ब्रह्मास्त्र हैं| सभी ब्रह्मास्त्र ब्रह्मा द्वारा निर्मित अति शक्तिशाली और संहारक अस्त्र हैं| हैं| ब्रह्मशिर अस्त्र साधारण ब्रह्मास्त्र से चार गुना शक्तिशाली हैं| साधारण ब्रह्मास्त्र की तुलना आधुनिक परमाणु बम तथा ब्रह्मशिर अस्त्र की तुलना हाइड्रोजन बम से की जा सकती हैं| ब्रह्मशिर अस्त्र के सिरे पर ब्रह्मा के चार मुख दिखाई पड़ते हैं, अतः दिखने में यह एक चतुर्शूल भाला अथवा एक तीर हैं| इसे चार प्रकार से चलाया जा सकता हैं- संकल्प से , दृष्टी से , वाणी से और कमान से| शिव के पाशुपतास्त्र (ब्रह्मशिर) में चार शूल हैं, अतः विम कड्फिस और कनिष्क के तमगे के चार शूल इसका प्रतिनिधित्व करते हैं|

कनिष्क के तमगे में चतुर्शूल पाशुपतास्त्र (ब्रह्मशिर) का प्रतिनिधित्व करता हैं, क्योकि प्राचीन भारत में पाशुपतास्त्र (ब्रह्मशिर) के अंकन का अन्य उदहारण भी हैं|  राजघाट, वाराणसी से एक मोहर प्राप्त हुई हैं, जिस पर दो हाथ वाली एक देवी तथा गुप्त लिपि में दुर्ग्गाह उत्कीर्ण हैं, देवी के उलटे हाथ में माला तथा तथा सीधे हाथ में एक चार शूल वाली वस्तु हैं| चार शूल वाली यह वस्तु पाशुपतास्त्र (ब्रह्मशिर अस्त्र) हैं, क्योकि पाशुपतास्त्र शिव की पत्नी दुर्गा का भी अस्त्र हैं| दुर्गा ‘नाना’ के रूप में कुषाणों की अधिष्ठात्री देवी हैं| रबाटक अभिलेख के अनुसार नाना (दुर्गा) कनिष्क की सबसे सम्मानीय देवी थी तथा नाना (दुर्गा) के आशीर्वाद से ही उसे राज्य की प्राप्ति हुई थी| अतः खास तौर से दुर्गा के हाथ में ‘पाशुपतास्त्र’ (ब्रह्मशिर) के अंकन से यह बात और भी अधिक प्रबल हो जाती हैं कि कनिष्क के तमगे में उत्कीर्ण चार शूल पाशुपतास्त्र का ही प्रतिनिधत्व करते हैं| नाना देवी का नाम आज भी नैना देवी (दुर्गा) के नाम में प्रतिष्ठित हैं| इनका मंदिर बिलासपुर, हिमांचल प्रदेश में स्थित हैं| यह मान्यता हैं कि नैना देवी की मूर्ती (पिंडी) की खोज एक गूजर ने की थी| ए. कनिंघम ने गूजरों की पहचान ऐतिहासिक कोशानो (कुषाणों) के रूप में की हैं| अतः कुषाणों का नाम आज भी नाना (दुर्गा) से जुड़ा हुआ हैं|

आंध्र प्रदेश के विजयवाडा स्थित ‘कनक दुर्गा’ मंदिर का नाम और इसकी स्थपना की कथा भी कनिष्क का नाम दुर्गा पूजा मत तथा शिव-दुर्गा के पाशुपतास्त्र से जोड़ते हैं| छठी शताब्दी में भारवि द्वारा लिखित ‘किरातार्जुनीयम्’ के अनुसार शिव और अर्जुन के बीच एक युद्ध आंध्र प्रदेश के विजयवाडा स्थित इन्द्र्कीलाद्री पर्वत पर हुआ था| युद्ध के पश्चात, शिव ने अर्जुन की वीरता से प्रसन्न होकर, उसे पाशुपतास्त्र (ब्रह्मशिर अस्त्र, चार शूल वाला तीर) प्रदान किया| शिव के अतिरिक्त पाशुपतास्त्र शिव की पत्नी दुर्गा का अस्त्र हैं| अतः अर्जुन ने इसी स्थान पर दुर्गा की उपासना की तथा भविष्य में कौरवो से होने वाले युद्ध में विजय प्रप्ति के लिए उनका आशीर्वाद प्राप्त किया| अर्जुन इस स्थान पर दुर्गा मंदिर का निर्माण कराया, जो अब कनक दुर्गा के नाम से जाना जाता हैं| अल बिरूनी (975-1048 ई.) ने अपनी पुस्तक तह्कीके हिन्द में कनिष्क को कनक (कनिक) लिखा हैं| अतः कनक दुर्गा मंदिर का नाम इसके कनिष्क से सम्बंधित होने का संकेत करता हैं| सातवी शताब्दी में हिंदुस्तान आने वाले चीनी तीर्थयात्री वांग हसूँ-त्से (Wang Hsuan-tse) के अनुसार कनिष्क ने महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के सातवाहन शासक पर आक्रमण भी किया था| अतः संभव हैं कनिष्क विजयवाडा आया हो तथा उसने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया हो| अतः यह तथ्य कि अर्जुन के द्वारा बनवाया गया दुर्गा मंदिर कनिष्क के नाम से जाना जाता हैं, कनिष्क के नाम को दुर्गा पूजा मत के विकास और पाशुपतास्त्र (ब्रह्मशिर अस्त्र, चार शूल वाला तीर) के प्राप्तकर्ता अर्जुन के नाम से समीकृत एवं सम्बंधित करता हैं|

शिव और दुर्गा पति-पत्नी हैं, इसलिए उनसे सम्बंधित धार्मिक विश्वासों को कई बार संयुक्त रूप से देखा जाना अधिक उचित हैं| शैव मत की तरफ झुकाव रखने वाले कोशानो सम्राटो की दुर्गा पूजा मत के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका थी| अतः कोशानो सम्राटो के सिक्को पर शिव-दुर्गा के पाशुपतास्त्र का अंकन एक स्वाभविक प्रक्रिया हैं| निष्कर्षतः  कनिष्क का शाही निशान ‘चतुर्शूल तमगा’ शिव-दुर्गा के पाशुपतास्त्र तथा नंदी के के पैर के निशान का मिश्रण हैं|

सन्दर्भ ग्रन्थ -
1. भास्कर चट्टोपाध्याय, दी ऐज ऑफ़ कुशान्स- ए न्यूमिसमैटिक स्टडी, कलकत्ता, 1967
2. भारत भूषण, दी अमेजिंग आर्चर, लोनावाला, 2011
3. श्री पद्म, विसिस्सीटयूड्स ऑफ़ दी गॉडेस: रीकंस्ट्रक्शन ऑफ़ दी ग्रामदेवता, 2013
4. जॉन एम, रोजेनफील्ड, दी डायनेस्टिक आर्ट्स ऑफ़ कुशान्स
5. जे. ए. बी. वैन ब्युइतेनेन (संपादक), दी महाभारत, खंड I, शिकागो, 1973
6.  मैग्गी लिड्ची-ग्रैस्सी, दी ग्रेट गोल्डन सैक्रिफाइस ऑफ़ दी महाभारत, नोइडा, 2011
7. बी. एन. मुख़र्जी, नाना ऑन लायन: ए न्यूमिसमैटिक स्टडी, एशियाटिक सोसाइटी, 1969
8. उमाकांत पी. शाह, जैन-रूप-मंडन (जैन इकोनोग्राफी), नई दिल्ली, 1987
9.  चिदत्मन (स्वामी), दी रिलीजियस स्क्रिपचर ऑफ़ इंडिया, खंड I, 2009

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

गुर्जर - प्रतिहारों के हूण पुरखें (प्रतिहारों के पितामह राष्ट्ररक्षक हूण)

गुर्जर - प्रतिहारों के हूण पुरखें (प्रतिहारों के पितामह राष्ट्ररक्षक हूण) -

इतिहासकार वी ए. स्मिथ , विलियम क्रुक एवं रुडोल्फ होर्नले गुर्जर प्रतिहारो को हूणों से सम्बंधित मानते हैं|

स्मिथ कहते हैं की इस सम्बन्ध में सिक्को पर आधारित प्रमाण बहुत अधिक प्रबल हैं| वे कहते हैं कि हूणों तथा भीनमाल के गुर्जरों, दोनों ने ही सासानी पद्धति के के सिक्के चलाये|होर्नले गुर्जर-प्रतिहारो को ‘तोमर’ मानते हैं तथा पेहोवा अभिलेख के आधार पर उन्हें जावुला ‘तोरमाण हूण’ का वंशज बताते हैं|पांचवी शताब्दी के लगभग उत्तर भारत को विजय करने वाले हूण ईरानी ज़ुर्थुस्थ धर्म और संस्कृति से प्रभावित थे|

वो सूर्य और अग्नि के उपासक थे जिन्हें वो क्रमश मिहिर और अतर कहते थे| वो वराह की सौर (मिहिर) देवता के रूप में उपासना करते थे| हरमन गोएत्ज़  इस देवता को मात्र वराह न कहकर ‘वराहमिहिर’ कहते हैं|

मुख्य तर्क यह हैं कि हूण और प्रतिहारो के इतिहास में बहुत सी समान्तर धार्मिक एवं सांस्कृतिक परम्पराए हैं, जोकि उनकी मूलभूत एकता का प्रमाण हैं| कई मायनो में प्रतिहारो का इतिहास उनकी हूण विरासत को सजोये हुए हैं| प्रतिहार वंश की उत्पत्ति हूणों से हुई थी तथा उन्होंने हूणों की विरासत को आगे बढाया था|

गुर्जर सुरत्राण महाराणा प्रताप

"गुर्जर सूरत्राण महाराणा प्रताप"
https://youtu.be/HtM8f73w1GI
ये शब्द एक फ़िल्म "#महाराणा_प्रताप" से लिये गए हैं जो कि "#ओमपुरी" जी की आवाज में है, एवं इसे CAST किया है "#दुर्गेश_राजपूत" जी ने..
मुझे इस शब्द का मतलब समझ नहीं आया ? क्या आप इसके बारे में कुछ कहना चाहेंगे ? इसका क्या अर्थ है ?
"गुर्जर सूरत्राण महाराणा प्रताप" वैसे थोड़ा जानने की कोशिश की तो बस इतना पता लगा कि "#सूरत्राण" एक मराठी शब्द है जिसका English Meaning "#SURVIVAL" होता है। विद्वान भाई वीडियो देख कर अपने अपने विचार दें ।

रविवार, 14 जनवरी 2018

राष्ट्रीय गुर्जर नेता चौधरी नेपाल सिंह कसाना ने अपना दल (एस) का दामन क्यों थामा, पढ़िए पूरी कहानी

#मैने_अपना_दल_एस_क्यूँ_ज्वाइन_किया
पिछले कई दिनों से तमाम साथी ओर शुभचिंतक लगातार ये प्रश्न कर रहे है कि हमने अपना दल(एस) को क्यों चुना??आखिर कैसे अपना दल(एस) के झंङे के नीचे पिछङो दलितो वंचितों शोषित किसान कमेरो का हित ओर राजनैतिक अस्तित्व मजबूत होगा???
इन सभी सवालों ओर जिज्ञासाओं को मै दूर करने के लिए आप लोगों के बीच हूँ।
सबसे पहले तो मै आपको अपनी सामाजिक ओर राजनैतिक पृष्ठभूमि से अवगत कराता चलता हूँ।मुझे 30 वर्ष का समाजिक एवं राजनैतिक अनुभव है। मैं  M.Sc. BEd हूँ, आयु 59 वर्ष है। सारे देश का भ्रमण कर चुका हूँ। गूर्जर समाज की विभिन्न गतिविधियों से 1975 से जुड़ा हूँ। कोई भी गुर्जर बाहुल्य क्षेत्र पुरें देश मे ऐसा नहीं है जिससे मैं परिचित नहीं हूँ। 7 राज्यों मे गुर्जर बाहुल क्षेत्रों मे हमारे परिवार काफ आर्थिक योगदान रहा है।मेरा पुरा परिवार भाई बहन बेटा बेटी सभी उच्च शिक्षित है ओर पुरे देश के विभिन्न प्रदेशो पिछले 35 साल से लगातार हमारी कंपनी के निर्माण कार्य संचालित है।शिक्षा के क्षेत्र मे विशेष कार्य करके पुरे देश मे विशेष ख्याति अर्जित की है।सामाजिक कार्य करने के कारण हर वर्गके लोगो का प्यार दुलार ओर सम्मान प्राप्त किया है।सर्वसमाज ने हमेशा से हमे ओर हमारे प्यार को सम्मान ओर प्यार से नवाजा है। कवि एवं पत्रकार होने के कारण देश विदेश के इतिहास का काफी अधययन किया हैं।ओर यूरोप के कई देशो का भ्रमण अब से 20 साल पूर्व कर चुका हूँ।अखिल भारतीय गुर्जर महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद पर वर्तमान मे कार्यरत रहकर समाज के कार्यो से जुङा हुआ हूँ। 2002 मे विधान परिषद स्नातक चुनाव मैने समाजवादी पार्टी से लङा ओर उपविजेता रहा।
14 वर्ष महान किसान नेता श्री राजेश पायलट के साथ तथा 15 वर्ष समाजवादी पार्टी मे रहकर यह अनुभव प्राप्त किया कि किसी भी जाति का महत्व उसकी संख्या, सगठन, एकता एवं उस जाति का अपने किसी लीडर को राजनीति के उच्च शिखर पर पहुचाने का जुनून होता हैं।
इतिहास के पन्नों को पढकर मैं इस निर्णय पर पहुंचा कि महान गुर्जर सम्राट कुषाण वंश (सन् 25 से 395) ,गूर्जर हूण सम्राट (सन 440से 495),  कन्नौज के महान प्रतापी गूर्जर प्रतिहार सम्राटों(सन525 से 1090) ने इस देश पर हजारों साल तक राज्य किया। 300 वर्षों तक अरबों के आक्रमण से गुर्जर प्रतिहार सम्राटों ने इस भारतीय संस्कृति को इस्लाम धर्म में परिवर्तित होने से बचाया। 1019 में महमुद ग़ज़नवी के आक्रमण से गुर्जर प्रतिहार वंश का उत्तर प्रदेश की कन्नौज राजधानी से शासन का  पतन के बाद -गुर्जर जाति की शौर्य गाथा खत्म हो गयी। परिणाम स्वरुप गुर्जर जाति के मूल से - 36 वंश राजपूत के, 70%कुर्मी, 80%पाटीदार ,60% मराठा की अनेको उप जातियों का उद्भव  हुआ। शेष गुर्जर क्षत्रिय 1090 से 1947 तक  निरन्तर सत्ता से टकराता रहा।परिणाम,अशिक्षा, विद्रोही स्वभाव, आर्थिक क्षति, सत्ता से दूर होना।
देश धर्म ओर राष्ट्र के लिए इतना बङा अदम्य साहस दिखाने के बाद भी महान गुर्जर सम्राट मिहिरभोज को देश के सत्ताधारी लोगों ओर सरकारो द्वारा इतिहास मे अनदेखा कर दिया गया। यहां तक कि महान प्रतापी सम्राट शिवाजी का राजतिलक तत्कालीन पुजारियों द्वारा पैर से अंगुठे से किया। आजाद भारत मे सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनने से रोका गया।वर्तमान मे उत्तर प्रदेश मे सरकार मे किसी गुर्जर को मंत्री मंङल का हिस्सा नहीं बनाया गया।गुजरात मे 88 पटेल विधायक सदन मे होने के बाद भी किसी पटेल को मुख्यमंत्री बनाये जाने लायक नही समझा गया। वर्तमान मे किसी गुर्जर कुर्मी या पटेल समुदाय के व्यक्ति को केन्द्रीय मंत्रीमंङल मे कैबिनेट स्तर का पद नही दिया गया।चाहे कभी वो राजेश पायलट रहे हो या संतोष गंगवार हो या फिर सचिन पायलट हो।
आज उत्तर प्रदेश, दिल्ली,उत्तराखंड, हरियाणा,पंजाब,हिमाचल, जम्मू कश्मीर, राजस्थान, मध्यप्रदेश,गुजरात एवं माहाराष्ट का हिन्दू मुस्लिम सिक्ख गुर्जर समाज आर्थिक एव शिक्षा के क्षेत्र मे बहुत आगे बढ गया है। अपनी खो हुई प्रतिष्ठा पुनः पाने के लिये उठ खड़ा हुआ है। राजस्थान  मे गूर्जर आरक्षण की माँग, गुजरात मे पाटीदार आरक्षण की माँग, महाराष्ठ मे मराठा आरक्षण की माँग पुरे देश मे गुजं रही है। लेकिन इतना सब होने के बाद भी हमारी मांगे नजरअंदाज की गई है ओर वो राजनैतिक हक हम लोगो को नही मिल पाया जिसके हम अधिकारी है।राजस्थान मे 72 कुर्बानियो के बाद भी, गुजरात मे 14 पाटिदारो की हत्या मंदसौर मे 8 पाटिदार किसानों की हत्या के बाद भी आखिर हमे क्या मिला?? हमारे संघर्ष ओर बलिदान का परिणाम क्या हुआ?? हम वहीं खङे रह गये जहा खङे थे।इसका कारण था हमारी आवाज ओर संघर्ष का एकजुट रूप ना होना, हमारा विखंङित होना।
आजादी के आज़ादी के बाद भी एक विशेष वर्ग के लोग राजनैतिक सत्ता पर काबिज है ओर दलित पिछङे गरीबो का सिर्फ शोषण ओर इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए इन लोगो द्वारा किया गया।
ये वही लोग है जिन्होने बाबा साहब अंबेडकर को चुनाव जीतने नही दिया।ओर समाज ओर देश को जातिगत रूप से बाँट कर रखा।
जो क्षत्रिय कभी सम्राट हुआ करते थे उनकी संतानों को इन लोगों ने पिछङे ओर अनुसूचित जाति के स्तर तक पहुंचा दिया।
पिछङो के आरक्षण की मांग जो नेहरू के समय से ही उठती आ रही है।उसको हमेशा दबाने का काम किया गया।जनता दल की सरकार के दौरान पूर्व प्रधान मंत्री चौधरी चरण सिंह के कार्यकाल के दौरान मंङल आयोग का गठन हुआ मगर कांग्रेस की सरकार ने उस रिपोर्ट को दबाया रखा। पुनः जनता दल की सरकार बनने पर बेहद ईमानदार उच्च शिक्षित महान व्यक्तितव के धनी वीपी सिंह के प्रधानमंत्री बनने पर मंङल आयोग की रिपोर्ट को लागू किया ओर उच्च श्रेणी के लोगों के विरोध को विरोध को दरकिनार कर दिया।
ये उच्च श्रेणी के लोग आज भी देश की न्याय व्यवस्था राज व्यवस्था ओर प्रशासनिक व्यवस्था पर काबिज है ओर दलितो पिछङो के हक को दबाये बैठे है।
आरक्षित वर्ग के लोगों के अधिकारों का हनन हो रहा है मगर फिर भी वो लोग जै कभी आरक्षण के हिमायती रहे है चुप है क्योंकि उनके अपने व्यक्तिगत राजनैतिक स्वार्थ है।ओर वो आरक्षित वर्ग के लोगो के हक मे बोलने पर खुद को असुरक्षित महसूस करते है।
देश की अर्थव्यवस्था ओर निजी क्षेत्रो मे उच्च वर्ग के लोग बहुतायत मे है।ओर ये 15% लोग देश के 50% संसाधनो उपयोग करते हुए 85% लोगों के अधिकारों का दोहन कर रहे है।
इसलिए आज आवश्यकता है इस पिछङे दलित वंचित शोषित वर्ग के लोगो की हको की लङाई को संगठित होकर लङा जाए। जिस तरह मौर्य,कुशवाह,सैनी,शाक्य उपजातियो का एक साथ आने से उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य मे सत्ता मे अपनी भागीदारी प्राप्त कर ली है। उसी तरह गूर्जर,कुर्मी, पाटीदार, मराठा को भी एक झण्डे के नीचे  आना होगा।
झण्डा अपना दल (एस )  पार्टी का मौजूद है।अपना दल(एस) के वर्तमान मे उत्तर प्रदेश मे 9 विधायक है और 2 सांसद है।उत्तर प्रदेश सरकार मे कारागार मंत्री अपना दल से है तो खुद 35 वर्षीय माननीय अनुप्रिया पटेल जी केन्द्रीय सरकार मे मंत्रीमंङल मे शामिल है।
शानदार व्यक्तित्व की धनी उच्च शिक्षित, प्रखर वक्ता, युवानेत्री , श्रीमती अनुप्रिया पेटल केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री एवं राष्ट्रीय संयोजिका अपना दल (एस)सम्पूर्ण राष्ट्र के  दबे ,कुचले,पिछड़े, किसान एवं कमेरौ की आवाज उठाने के लिये तैयार है। उनका कहना है कि-सत्ता और पद सुख भोगने के लिये नहीं है। यह तो दबे, मपिछड़े, कमेरो एवं गरीबों के कल्याण और उनकी सेवा के लिए होती है। इसीलिए मैंने उसी पीड़ा के साथ अपने इतिहास की सभी अपनी मूल जातियों की एक एकता तथा सत्ता केउच्च शिखर पर देखने के लिए अपने रक्त संबंधी पार्टी का दामन थामा है। आजाद देश के महान नेता, भारत रत्न लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल के एक ही वंशज  होने के कारण हम पूरी ताकत झोंककर अपनी नेता श्रीमती अनुप्रिया पटेल को महान नेत्री बना सकते हैं।हम सभी को विशेषकर युवाओं को गैर इनंसाफी के खिलाफ एक आवाज  बनकर हमें घर से निकलकर सड़कों पर आना होगा तथा देश के सभी जाति ,धर्म के लोगो को प्रेम व सम्मान के साथ अपने झण्डे के नीचे लाना होगा। मेरी प्रतिज्ञा, निष्ठा और तन ,मन, धन ताउम्र उनके साथ रहेगा।
अगर हम लोग संगठित हो जाए तो एक बङी राजनैतिक ताकत देश मे बन सकते है।गुर्जर कुर्मी पटेल पाटीदार मराठा आज देश मे 27 करोङ है।जो खुद मे एक बहुत बङी  राजनैतिक ताकत है।
जय मिहिरभोज।। जय शिवाजी।।जय सरदार।।
जय गुर्जर।।जय कुर्मी।।जय पाटीदार।।जय मराठा।।

चौधरी नेपाल सिंह कसाना
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष/पश्चिमी उप्र प्रभारी/राजस्थान प्रभारी
अपना दल (एस)

सोमवार, 8 जनवरी 2018

गुर्जरों को आरक्षण नहीं तो भाजपा को वोट नहीं : धीरज गुर्जर


गुर्जरों को आरक्षण नहीं तो भाजपा को वोट नहीं : धीरज गुर्जर

(मांडलगढ़/ दिनांक 08 जनवरी 2018)
 
अखिल भारतीय युवा गुर्जर महासभा राजस्थान के प्रदेश महासचिव धीरज गुर्जर ने कहा कि भाजपा सरकार ने गुर्जर आरक्षण के मामले में कमजोर पैरवी करने की वजह से गुर्जर आरक्षण न्यायालय में अटका| 2013 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में गुर्जर, रेबारी, बंजारा, गाड़िया लोहार, गाडरी जातियों को विशेष पिछड़ा वर्ग में 5% आरक्षण देने का वादा किया था लेकिन भाजपा सरकार की कमजोर पैरवी के कारण पांचो जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिला इसकी जिम्मेदार वर्तमान भाजपा सरकार है| गुर्जर समाज 5% आरक्षण के लिए हर संघर्ष को तैयार है और आंदोलन की रूपरेखा बनाई जा रही है| गुर्जर समाज 50 प्रतिशत सीमा के दायरे में 5 प्रतिशत आरक्षण लेकर रहेगा चाहे बलिदान होना पड़े| बहुत जल्द ही 5% गुर्जर आरक्षण को लेकर मांडलगढ़ में गुर्जर महापंचायत का आयोजन किया जायेगा जिसमें देशभर के गुर्जर नेता भाग लेंगे| पूर्व में हुई सभी भर्तियों में समझौते के मुताबिक एसबीसी का 5% बेकलॉग भरा जावे और गुर्जर सहित पांचों जातियों को 5% आरक्षण 50% सीमा के दायरे में लागू किया जावे, अगर सरकार ने समय रहते गुर्जर आरक्षण लागू नहीं किया तो मांडलगढ़ विधानसभा के उपचुनाव में गुर्जर समाज भाजपा का बहिष्कार करेगा|

                 धीरज गुर्जर
               प्रदेश महासचिव
अखिल  भारतीय युवा गुर्जर महासभा राजस्थान