रविवार, 20 अगस्त 2017

गुर्जर इतिहासकार श्री इसम सिंह चौहान की गुर्जर समाज के नाम एक अपील

एक अपील �� गुर्जर समाज अपने इतिहास के महान शासकों को श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है, यह एक शुभ संकेत है। निस्संदेह सम्राट मिहिरभोज का भारतीय इतिहास में कोई सानी नहीं है। वे सम्राट अशोक से भी महान थे। उनकी जयंती समारोह को हमें सोल्लास मिहिरोत्सव या राष्ट्रीय गुर्जर दिवस के रूप में मनाना चाहिए। जहां तक अंतरराष्ट्रीय गुर्जर दिवस की बात है वह भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में कनिष्क महान का राज्यरोहण दिवस के दिन 22 मार्च को मनाया जाता है क्योंकि सम्राट कनिष्क का साम्राज्य विश्व के अनेक देशों तक विस्तारित था। हमारे इन दोनों महान शासकों के बीच हमें विरोधाभास से बचना चाहिए। �� जय गुर्जर जय भारत �� आपका अपना �� इसम सिंह चौहान अध्यक्ष राष्ट्रीय गुर्जर इतिहास शोध, साहित्य एवं भाषा संस्थान।

शनिवार, 19 अगस्त 2017

24 अगस्त को मिहिरोत्सव मनाएगा गुर्जर समाज: बिटटू कसाना जावली


24 अगस्त ..... " मिहिरोउत्सव "

किसी भी समाज के लिए उसके इतिहास का महत्व अमूल्य है। एक गौरवशाली इतिहास की उपेक्षा कर कोई भी राष्ट्र या कौम उन्नति नहीं कर सकती।यदि किसी राष्ट्र को सदैव अधःपतित एवं पराधीन बनाये रखना हो ,तो सबसे अच्छा उपाय यह है कि उसका इतिहास नष्ट कर दिया जाये | जो जाति अपने पूर्वजों के श्रेष्ठ कार्यों का अभिमान नहीं करती तो समझ लीजे वो अपने पतन की तरफ अग्रसर है !!!

जिस परिवेश में नौकरी करता हूँ वो आपको ' जातिवाद ' से दूर रखता है और रहा भी हूँ ... हर धर्म और जात को पूरा सम्मान दिया है | फेसबुक एक ऐसा प्लेटफार्म भी हैं जहाँ आप अपने मन की बात को रख सकते है | गुर्जर बिरादरी में पैदा होने का अभिमान था , है भी और रहेगा भी !!!

आज तक किसी अन्य को नीचा दिखाना सोच में भी नही रहा है ... बस हमे अपनी ' खुदी ' को बुलंद करना है | इस लेख के माध्यम से मैं गुर्जर साथियो को अपने पूर्वज महान गुर्जर सम्राट मिहिरभोज के सन्दर्भ में अवगत कराना चाहता हूँ जिससे आपको अपने महाप्रतापी पूर्वज के बारे में ज्ञान हो सके... जिन्हें पहले से ही हैं वो रिफ्रेश कर सकते है और अगर कही पर ऐताहासिक तथ्यात्मक त्रुटि है उसे मुझे बतलाये |

भारतीय इतिहास में 750 AD से लेकर 1000 AD के दरमियान तीन साम्राज्यों का प्रमुखता से उल्लेख मिलता है | पहला ' पाल वंश ' , दूसरा " गुर्जर प्रतिहार वंश " और तीसरा ' रास्त्रकूट वंश ' | " गुर्जर प्रतिहार राजवंश "  की एक शाखा, जो मालव में आठवीं शताब्दी के प्रथम भाग से शासन करती रही थी, इसका सबसे प्राचीन ज्ञात सम्राट् नागभट प्रथम था, जो अपने मालव राज्य को सिंध के अरबों के आक्रमणों से बचाने में सफल हुआ था।

आठवीं शताब्दी के अंतिम भाग में इस वंश के राजा वत्सराज ने गुर्जरदेश राज्य को जीत लिया और उसे अपने राज्य में मिला लिया। उसके पश्चात् उसने उत्तर भारत पर अपनी प्रभुता स्थापित करने के लिये बंगाल के पालों से अपनी तलवार आजमाई। उसने गंगा और यमुना के बीच के मैदान में पाल धर्मपाल को परास्त कर दिया, और अपने सामंत शार्कभरी के चहमाण दुर्लभराज की सहायता से बंगाल पर विजय प्राप्त की, और इसी प्रकार वह गंगा के डेल्टा तक पहुँच गया।

वत्सराज का पुत्र तथा उत्तराधिकारी नागभट द्वितीय, सन् ८०० ई. के लगभग गद्दी पर बैठा था। नागभट द्वितीय का पौत्र सम्राट मिहिर भोज ' गुर्जर प्रतिहार वंश ' का सबसे महान् सम्राट् समझा जाता है उसके राज्यकाल में प्रतिहार राज्य पंजाब और गुजरात तक फैल गया। भोज बंगाल के पालों, दक्षिण के राष्ट्रकूटों और दक्षिणी गुजरात से लड़ा, और उतर भारत के हृदय " कन्नोज " पर सदैव अपना दबदबा बना कर रखा |   

मिहिरभोज के बारे में इतिहासकार कहते है कि उसके साम्राज्य में उस वक़्त 1,800, 000 गाँव /शहर थे और ये लगभग 2000 KM लम्बा व् चौड़ा था | मिहिरभोज की सेना में 4 डिवीज़न थी और हर डिवीज़न में लगभग 8/9 लाख सैनिक थे | और उस वक़्त उनके पास 2000 हाथी भी थे | चूँकि राजा , भगवान् विष्णु के उपाशक थे तो उन्हें ' आदिवराह ' भी कहा गया है | और इस तरह से मिहिरभोज , उज्जैन के परमार वंश के बाद के एक राजा भोज से अलग एक शक्शियत रहे है |

दोस्तों , आने वाली 24 अगस्त को आपके महान प्रतापी गुर्जर सम्राट मिहिरभोज जी की जयंती है | तो आईये मिलकर अपने " बुड्ढे " के 1201वे प्रकाश उत्सव को " मिहिरोउत्सव " के रूप में मनाये और गौरवानित महसूश करे |  अगर संभव हो सके तो ... नीचे दिये गये पिक को अपना प्रोफाइल पिक बना कर अपने महान व् प्रतापी पूर्वज को सम्मान प्रदत कीजे |

आभार व् नमन |

सोमवार, 14 अगस्त 2017

क्रांति की मशाल जलती रहे: विजेंद्र कसाना एडवोकेट

साथियो जब वीर क्रांतिकारियों ने अंग्रेजो को भगाया तब किसी प्रकार का संचार का सुगम साधन नही था! फिर भी उस क्रांति की प्रबलता ओर परिणाम विश्व विदीत है| कारण आज तक ढुढा जा रहा है| पर कारण कोई ओर नही सिर्फ जुल्म की पराकाष्टा था| आज आप के पास संचार के प्रबल माध्यम है जो हर शोषित तक पहुचने का सीधा माध्यम है| उस समय अंग्रेजो ने फासी चढ़ा कर लाखो क्रांतिकारी गुर्जरों को मारा आज स्वयं आर्थिक विषमता के कारण (किसान) आत्महत्या कर रहे है क्या आजाद भारत मे यह क्रम चलता रहेगा| क्या अब भी हम काले अंग्रेजो की रहनुमाई मे आशाओ के साथ जिते मरते रहेगे| नहि हा जो लम्बा-लम्बा लेख लिखते हे भाषण देते हे उन्हे थोडी पिडा़ होगी विजय आप के द्वार खडी है ईसे छुने भर से सारे कष्ट मिटजायेगे  आप की आबादी आप की ताकत ओर आप का सोना आप की कमजोरी

रविवार, 13 अगस्त 2017

गुर्जर समाज का अहम निर्णय 24 अगस्त को मिहिरोत्सव और हर वर्ष की भांति 22 मार्च को अंतरराष्ट्रीय गुर्जर दिवस मनाएगे

याद है आपको कि
"सौ कोस का गुर्जर एक हो जाता है |"
समाज में कुछ लोग दो-दो अंतराष्ट्रीय गुर्जर दिवस मना कर ना सिर्फ बांटने का कार्य कर रहे है बल्कि समाज को मज़ाक बनवा रहे है | इनको अपनी जिम्मेवारी का एहसास होना चाहिए |
ऐसे में वो सभी गुर्जर जो इस महासभा से जुड़े नहीं है उनकी जिम्मेवारी ज्यादा बढ़ जाती है कि वह इस दिशा में कुछ करें | इसलिए आप सभी से अनुरोध है कि अब से भविष्य में हम मिहिर भोज़ जयंती को हर वर्ष 'मिहिरोत्सव' के रूप में मनाये | अंतराष्ट्रीय गुर्जर दिवस 22 मार्च को ही  मनता रहना चाहिए | आखिर एक महासभा की मनमानी सारा गुर्जर समाज क्यों सहन करें | गुर्जर समाज 'एक महासभा' से बहुत विस्तृत और विशाल है |
मिहिरोत्सव को आप छोटे-बड़े स्तर पर मनाये | बहुत छोटे स्तर पर ये किया जा सकता है कि कुछ भाई-बहन कुछ 40-50 गरीबों को पूरी-सब्जी खिला दे या बाँट दे |
सौ कोस के गुर्जर को एक होने की आवश्यकता है आज |
कृपया ज्यादा से ज्यादा शेयर करें |

सभी गुर्जर संगठनों का एकमत निर्णय 24 अगस्त को गुर्जर समाज मनाएगा मिहिरोत्सव

याद है आपको कि
"सौ कोस का गुर्जर एक हो जाता है |"
समाज में कुछ लोग दो-दो अंतराष्ट्रीय गुर्जर दिवस मना कर ना सिर्फ बांटने का कार्य कर रहे है बल्कि समाज को मज़ाक बनवा रहे है | इनको अपनी जिम्मेवारी का एहसास होना चाहिए |
ऐसे में वो सभी गुर्जर जो इस महासभा से जुड़े नहीं है उनकी जिम्मेवारी ज्यादा बढ़ जाती है कि वह इस दिशा में कुछ करें | इसलिए आप सभी से अनुरोध है कि अब से भविष्य में हम मिहिर भोज़ जयंती को हर वर्ष 'मिहिरोत्सव' के रूप में मनाये | अंतराष्ट्रीय गुर्जर दिवस 22 मार्च को ही  मनता रहना चाहिए | आखिर एक महासभा की मनमानी सारा गुर्जर समाज क्यों सहन करें | गुर्जर समाज 'एक महासभा' से बहुत विस्तृत और विशाल है |
मिहिरोत्सव को आप छोटे-बड़े स्तर पर मनाये | बहुत छोटे स्तर पर ये किया जा सकता है कि कुछ भाई-बहन कुछ 40-50 गरीबों को पूरी-सब्जी खिला दे या बाँट दे |
सौ कोस के गुर्जर को एक होने की आवश्यकता है आज |
कृपया ज्यादा से ज्यादा शेयर करें |

रविवार, 6 अगस्त 2017

राजस्थान सरकार फिर ना कर देवे गुर्जरों के साथ धोखा: हिम्मत सिंह गुर्जर

राजस्थान गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के प्रदेश प्रवक्ता हिम्मतसिंह गुर्जर के निवास पर युवा चिंतन बैठक का आयोजन| 50 प्रतिशत के अंदर आरक्षण ओर लालसोट हत्याकांड के आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए 9 अगस्त को गाजीपुर(महुआ) में महापंचायत।
आज 6 अगस्त  को गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के प्रवक्ता हिम्मत सिंह गुर्जर के निवास पर 5 प्रतिशत आरक्षण,जातीय हत्याकांड के आरोपियों की गिरफ्तारी,दर्ज मुकदमो की वापसी के मुद्दे,ओर 9 अगस्त को प्रस्तावित गाजीपुर की महापंचायत के बारे में चिंतन बैठक का आयोजन हुआ। सभी समाज के युवाओ में कहा कि हमारा आरक्षण 50 प्रतिशत से बाहर 3 बार कोर्ट से अटक चुका है,सरकार से मिलकर समाज के कुछ लोग 50 प्रतिशत से बाहर पुनः आरक्षण का सौदा कर रहे है। जो समाज के साथ सरासर अन्याय है।
बैठक में समाज के युवाओ ने 5 मुद्दों को प्रस्तावित किये।
जिनमे
1.आरक्षण 50 प्रतिशत कानूनी रुप से दिया जाए|
2.लालसोट जातीय संघर्ष में   मारे गए समाज के लोगो के लिए सरकार ने जो जांच बिठाई थी उसमे cid/cd की जांच में पुलिस ने 40 मुलजिम मांन लिये है ,उनकी अभी तक गिरफ्तारी नही हुई है, दोषियों को जल्द गिरफ्तार किया जाए, इसके अलावा दर्जे मुकदमो को वापस लेने,की मांग को प्रसवित किया गया। समाज के जागरूक युवाओ से निवेदन है कि आज पूरी गतिविधि से आप बाकिफ हो, हमे कानूनी विधिक रूप से आरक्षण चाहिए,50 प्रतिशत से बाहर 3 बार आरक्षण अटक चुका है।। सरकार कानूनी हक दे नही तो आंदोलन किया जाएगा| सभी 9 अगस्त को गाजीपुर पहुंचे ओर कानूनी मांग सरकार के समक्ष करे|

अन्तर्राष्ट्रीय गुर्जर दिवस (International Gurjar Day) तो 22 मार्च को ही मनेगा

अंतराष्ट्रीय गुर्जर दिवस(IGD) तो 22 मार्च को ही मनेगा!

हमेँ अपने साथ विश्व भर में फैले उन गुर्जर भाईयो की भावना का ध्यान रखना है जो अब तक अंतराष्ट्रीय गुर्जर दिवस को हर साल 22 मार्च को ही मनाते आएं है !

हमेँ पूरा यकीन है कि हमारा गुर्जर समाज अपनी प्रसिद्ध "एकता की शक्ति " का परिचय देकर किसी के बहकावे में नही आएगा !

क्योकि अगर इस बार हम टूटे तो अन्य समाजो के लोग हमारी "गुर्जर एकता" पर शक करेँगे !

शनिवार, 5 अगस्त 2017

24अगस्त2017 को गुर्जर सम्राट मिहिरभोज जयन्ती को गुर्जर समाज मनाएगा मिहिरोत्सव के रूप में

*** मिहिरोत्सव***
24 अगस्त 2017 को गुर्जर सम्राट मिहिर भोज़ की जयंती को समस्त गुर्जर समाज एक उत्सव की तरह मनायेगा | जो लोग इसे जबरदस्ती 'अंतराष्ट्रीय गुर्जर दिवस' के रूप में रंगना चाहते है वे वास्तव में अपनी जिम्मेवारी को अपने अहम से ऊपर नहीं रख रहे है | जब 22 मार्च को अंतराष्ट्रीय गुर्जर दिवस मनाया जाता है तो एक सभ्य समाज को ये शोभा नहीं देता कि वह दूसरा ऐसा कोई दिवस मनाये |
ऐसे में समाज के हर गुर्जर का ये कर्तव्य बन जाता है कि महासभाओं की मनमानियों को नकार कर 'मिहिरोत्सव' मनाये |
जय गुर्जर, जय मिहिरभोज |
#24AugustMihirotsav

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

असली गौ रक्षक और गोपालक गुर्जर है

The REAL "Gau Rakshaks" of Hindustan

MUSLIM VAN GUJJARS OF HIMACHAL PRADESH

Photo: Sanchari Pal

Muslim Van Gujjars of Himachal Pradesh ( different from Gaddis shepherds ) carrying an injured baby buffalo (calf) over Himalayan pass for treatment at nearest veterinary hospital.

सामाजिक अधिकारों के लिए संघर्ष करो: चौधरी राजेश मोहन एडवोकेट

समाज सेवा के 6 मूल मंत्र
1.समाज के लिए लड़ाई लड़ो।
2. लड़ नही सकते तो लिखो।
3. लिख नही सकते तो बोलो।
4. बोल नहीं सकते तो साथ दो।
5. साथ भी नहीं दे सकते तो जो लिख और बोल रहे हैं ,जो लड़ रहे हैं, उनका अधिक से अधिक सहयोग करें। संघर्ष के लिए ताकत दें।
6. ये भी न कर सकें तो कम से कम मनोबल न गिरायें । क्योकि कहीं न कहीं कोई आपके हिस्से की भी लड़ाई लड़ रहे है।

बुधवार, 2 अगस्त 2017

1871 में अंग्रेजों ने देशभक्त गुर्जर समुदाय पर क्रिमिनल एक्ट लगाया- चौ. परवेज पंवार

गुर्जर और अपराधजीवि जनजाति (क्रिमिनल ट्राइब):-मुग़ल या गोरो के राज में जो जातियां इनके कामो में टांग अड़ाया करती थी या रोड़ा बनती थी ऐसी जातियां हमेशा से ही गोरे और मुग़लो के गले की फांसबनी रही । गुर्जर जो की एक क्षत्रिय जाती है, अपना गुजर बसर खेती बाड़ी और पशुपालन के द्वारा करती है साथ में कई सदियो से भारत के ही नही अपितु देश दुनिया के कई भागो पर अपना साम्राज्य स्थापित करने वाली गौरवशील जाती है । मिहिर कुल हूंण, राजा मिहिर भोज, सम्राट कनिष्क, नागभट्, आदि कई शूर वीर योद्धा इसी महान गुर्जर जाती से सम्बंधित थे । परंतु आज कई लोगो के द्वारा गुर्जरो पर कटाक्ष किया जाता है गुज्जर"चोर" है "डकैत" है या ये भी कह के गुर्जरो से घृणा कि जाति है की ये जाती तो असमाजिक है भैंसचोर है आदि आदि आइये देखे क्यों है ये जाती असमाजिक, चोर, या डैकत?अपराधजीवि जनजाति या विमुक्त जाती, ये एक ऐसा तमगा था जो ब्रिटिश सरकार ने उन जातियो को प्रदान किया जो देश भक्त थी जिन्होंने देश के लिए कुर्बानी दि जिन्होंने अपना सब कुछ त्याग कर देश के लिए बलिदान दिया, भारत के ब्रिटिश-राज के गवर्नर जनरल की अगुवाई में सन् 12 अक्टूबर 1871 में लागु किया गया criminal act जिसे बाद में स्वतन्त्र भारत की सरकार ने बदल के Hebitual Offenders Act 1952 में बदल दिया, 1871 criminal act सबसे पहले उत्तरी भारत में लागु किया गया बाद में 1876 में Bengal Presidency में लागू किया गया फिर 1911 में Madras Presidency और आखिर में 1924 में इस act कोसमूचे भारत में लागु कर दिया गया । इसके अधीन भारतीय मूल की वो जातिया या समूह जिनको चोर, डैकैत,विद्रोही जैसे संगीन और गैर जमानती जुर्म करने वाले कह के सम्भोदित किया गया जिनको सरकार ने बाकायदा सूचीबद्ध किया और क्योंकि ऐसे जातियो को अपराध् करने का आदि समझा गया, इसीलिए उनके आम तौर पर किये जाने वाले विचरण पर भी क़ानूनी प्रतिबन्ध लगाया गया और साथ ही इन जातियो से सम्बन्ध रखने वाले लोगो के वयस्क मर्दों को हफ्ते दर हफ्ते स्थानीय पुलिस चौकियों में हाजरी देने पर मजबूर किया गया।हास्यपद यहाँ ये बात भी है की ऐसी जातियो में जन्म लेने वाले बालक को भी जन्मजात अपराधी घोसित कर दिया जाता था।1883 में एक inquiry बैठाई गयी ये देखने के लिए की इस एक्ट में क्या तब्दीलियां करी जा सकती है और इसी फलस्वरूप 1887 के बदलाव में 4 से 18 साल तक के लड़को को अपने माँ बाप से दूर कर दिया जाता है क्योंकि वो पैदाइशी अपराधी है !!क्यों पड़ी ब्रिटिश सरकार को ऐसा कानून बनाने की ज़रूरत?गुज्जरों ने मुग़लो और ब्रिटिश सरकार के लगभग हर कदम का विरोध किया जिसवजह से उन्हें इस एक्ट का भुगतभोगी बनना पड़ा। 18वि शताब्दी में जब ब्रिटिश राज अपने पूर्ण वर्चस्व पर था, उस समय कई गुज्जर साम्राज् भी अपने शिखर पर थे, रोहिल्ला नवाब नजीब-उद्-दौला के समय में, गुर्जर दरगाह सिंह जिनके अधीन दादरी के 133 गाँव थे और जिनसे लगभग 29,000 रुपये लगान आता था जो वे अंग्रेजो को नहीं देते थे, मेरठ के राजा गुर्जर नैन सिंह का परीक्षितगढ़ का किले को 1857 में तोड़ दिया गया क्योंकि इसे अँगरेज़ पुलिस चौकी की तरह प्रयोग करना चाहते थे। इतिहास बताता है की 1857 के विद्रोह में गुज्जर ब्रिटिश सरकार के कट्टर विरोधी थे, 1857 के विद्रोह में एक विरोधी गुर्जर समूह ने 21 मई 1857 में बुलंदशहर में ब्रिटिश सरकार की सम्पति को काफी हानि पहुँचाई,1857 के विद्रोह में लुधियाना के मुस्लिम गुज्जरो ने ब्रिटिश सरकार का हर प्रकार से विरोध किया । उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के गंगोह में जब अंग्रेजी सरकार ने अपनी रूचि दिखाई उसका भी गुज्जर क्रन्तिकारीयों ने जमकर विरोध किया, जिन्हें बाद में अंग्रेजी सरकार ने भारतीय मूल की कुछ अन्य जातियो के साथ मिलकर गुज्जर विद्रोहियों को खदेड़ दिया ।अंग्रेजी हुकूमत के दस्तावेज बताते है की किस तरह गुज्जर, सरकार और सरकारी सहयोगियों के हथियार, दस्तावेज, रुपया, घोड़े आदि चुरा लिया करते थे ताकि सरकार निर्मम लोगो पर अत्याचार न कर सके ओर सरकार कमजोर पड़ जाये।इन्ही सब की वजह से 1871 में criminal act लाया गया ताकि गुज्जरों की ब्रिटिश सरकार के खिलाफ की जाने वाली दबंगई को रोका जा सके, आज जो लोग गुज्जरों को खुले आम चोर डैकैत बोलते है वो जरा इसे पढ़कर सोचे की वो क्यों चोरी डकैती करते थे गुर्जर किसी भारतीय या गरीब के यहा चोरी डकैती नही करते थे गुर्जर विद्रोही अंग्रेज ओर उनके सैनिको के यहा लूट मार किया करते थे जिससे अंग्रेज कमजोर हो ओर विद्रोहियों को संघर्ष मे मदद मिल सके लेकिन इन सबको लोगो ने गलत पेश किया ओ

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

न्याय की आस में अन्नत्याग के 600 दिन पूरे, पीरदान सिंह राठौड़ की कहानी उन्हीं की जुबानी से

न्याय की आस में अन्नत्याग के 600 दिन पूरे, पीरदान सिंह राठौड़ की अनोखी कहानी उन्हीं की जुबानी से
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अन्नत्याग अनसन के आज 600 दिन पूरे हो गये।इन 600 दिनों में कई कठिनाइयों का सामना हुवा,मौत को भी करीब से देखा है और दुनियां को भी करीब से देखने का मौका मिला।ज्यो-ज्यो समस्याएं सामने आती रही त्यों-त्यों शरीर दिमाग में छुपी हुई सामर्थ्य और शक्तियां बाहर निकलती गई जिससे कठिनाइयों से सामना करने में मदद मिलती रही।

इन 600 दिनों के अनसन से एक तरफ तो 100 प्रतिशत सफलता मिली है कि जो कलंक पीरदान-परिवार पर लगा था वो पूर्णतया धूल चुका।दूसरी तरफ न्याय के लिए जांच की मांग को लेकर निकला था उसमें पूरी तरह से असफलता ही मिली है पर मन में सकून यह रहा की जांच के लिए वो सब कुछ करने में सफल रहा जो एक आदमी को करना चाहिये। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति से एक से अनेक बार आदेश करवा दिये उसके बाद भी एक आईपीएस अधिकारी नही मिल पाया तो यह हमारी नही बल्कि भारत के प्रधानमंत्री,राष्ट्रपति,लोकतंत्र व सविंधान की बेइज्जती है।

इन 600 दिनों में कुछ गलतियां भी हुई है जिनके लिए सिर्फ पछतावा ही किया जा सकता है मुख्य रूप से गलती यह रही की उन लोगो पर भरोषा किया जो खुद भरोषा लायक नही थे,उन लोगो पर विश्वास जता बैठा जो खुद विश्वास के लायक नही थे।जीत नही पाया जिसका मुख्य कारण यह रहा की 99 बेईमान एक तरफ हो गये जिससे ईमानदार बेबस हो गया क्योंकि 99 कुत्ते मिलकर एक शेर की शिकार तो नही कर पाये लेकिन सफलता के रास्ते में रोड़ा जरूर बन गये।

और सबसे बड़ी गलती यह कर बैठा की इस देश के सविंधान को 26 जनवरी 1950 का मान बैठा जबकि यह सविंधान तो 1935 में ही अंग्रेजो ने लिख दिया था।अंबेडकर ने तो इसके ऊपर सिर्फ रंग-रोशन,पेंट-चूना लगाकर पंडित नेहरू के हाथों में थमा दिया था जिसमे अंग्रेजो दुवारा किये गये अन्याय अत्याचार पर पर्दा डालने के लिए ज्यादा काम आता है और आम जनता को न्याय के नाम पर लोलीपोप या फिर बाबाजी का ट्ठुलु ही पकड़ाया गया है इसी सविंधान से गोरे अंग्रेज अपने आप को बचाते थे और उनके बाद उनके दुवारा पैदा की गई नाजायज औलादे जो काले अंग्रेजो की शक्ल में कुर्शियो पर बैठे हुये है वो भी इसी सविंधान की आड़ लेकर अपने कुकर्मो को छिपाने का काम करते चले जा रहे हैं।

जो 600 दिन पहले मांग थी वही माँग आज है-विभिन न्यायालयों में दर्ज 9 मुकदमो की सीबीआई जांच या फिर स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अधीक्षक श्री पंकज चौधरी व इनकी टीम से जाँच हो।प्रण वही है जो 600 दिन पहले था-अनसन उसी दिन खत्म होगा जिस दिन जांच मिलेगी या फिर मौत मिलेगी।

रघुकुल रीत सदा चली आई,प्राण जाय पर वचन नही जाई।अनसन मेरी नया है,कलम मेरी पतवार है,हर पल की हर जानकारी,खुले आम बाजार है। 100 में से 99 बेईमान फिर भी मेरा भारत महान।

वन्देमातरम हमारी राष्ट्रभक्ति का गान है: सुनील सत्यम

वन्देमातरम हमारा मज़हबी गान नही है,यह राष्ट्रभक्ति का गान है।
देश का बहुसंख्यक वर्ग छद्म-धर्मनिरपेक्षता की केंचुली से बाहर निकल रहा है,इसका श्रेय उन लोगों को है जो हर मुद्दे पर मज़हबी नज़रिए से नुक्ताचीनी करते हैं। ऐसा करने वाला व्यक्ति कभी "धर्मनिरपेक्ष" नही हो सकता है जो राजनीतिक,सामाजिक सभी मुद्दों पर मज़हबी नजरिये से प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।जो व्यक्ति वन्देमातरम सिर्फ इसलिए नही गाना चाहता है कि उसका मज़हब ऐसा करने की इजाज़त नही देता है,वह सेकुलर होने का सिर्फ ड्रामा मात्र कर सकता है!
हम वन्देमातरम इसलिए नही कहते हैं कि यह हमारे धर्म का कोई मूलमंत्र है,वरन इसलिए गाते है कि यह मातृभूमि के प्रति हमारा प्यार एवं लगाव प्रदर्शित करने की अदभुद अभिव्यक्ति है।
अक्सर वह लोग सेकुलर होने का ज्यादा ढोंग करते हौ जिन्हें इसकी अवधारणा का कोई ज्ञान नही है।
   #सुनील सत्यम