गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

कौम के प्रति त्याग और समर्पण हो तो देवराज गुर्जर जैसा

कौम के प्रति त्याग और समर्पण हो तो देवराज गुर्जर जैसा
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दुनिया की अद्वितीय शादी
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धरना स्थल पर ही रचाई शादी, वधु बोली-मांग नहीं मानी तो वह धरने पर बैठ जाएगी
2017-02-23
सिकंदरा. दौसा जिले के सिकंदरा कस्बे में गुरुवार को गुर्जर शहीद स्मारक पर आठ दिन से धरने व अनशन पर बैठे एसबीसी चयनित अभ्यर्थियों में से  देवराज गुर्जर ने शुक्रवार को धरना स्थल पर ही शादी रचाई। उसने धरना स्थल पर वधु ममता को अपनी जीवन संगिनी बनाने के हिन्दू परम्परा से सात फेरे लिए।

इस दौरान बड़ी संख्या में गुर्जर समाज के लोग मौजूद थे। वर-वधु के परिवार के लोग धरना स्थल पर मौजूद रहे। धरना स्थल पर महिलाओं ने मंगलाचार गीत गाए। शादी के दौरान लोगों ने सरकार विरोधी नारे भी लगाए तथा चयनित अभ्यर्थियों को शीघ्र नियुक्त की मांग की। गुर्जर स्मारक भगवान देवनारायण के जयकारों से गूंज उठा।

उल्लेखनीय है कि विभिन्न परीक्षाओं  में चयनित एसबीसी अभ्यर्थियों द्वारा 12 फरवरी से धरना शुरू किया था। इसके दो दिन बाद आधा दर्जन अभ्यर्थी आमरण अनशन पर बैठ गए। इसी बीच आधा दर्जन अनशनकारियों की तबीयत बिगडऩे से अस्पताल में भर्ती कराया गया। सरकार द्वारा अभ्यर्थियों की नियुक्ति के मामले में सकारात्मक जवाब नहीं मिलने से प्रतिदिन अनशनकारियों की संख्या बढ़ती गई।  गुरुवार सुबह से देवराज की धरना स्थल पर शादी को लेकर गुर्जर समाज के लोगों ने बैठक में चर्चा की।


वधु बोली मांग नहीं मानी तो वह धरने पर बैठ जाएगी
सात फेरे के बाद वधु ममता ने संबोधित करते हुए कहा कि सरकार ने मांग नहीं मानी तो वे भी अपने पति के साथ अनशन में शामिल होगी। शादी के बाद वधु पीहर गुढाआशिकपुरा के लिए रवाना हो गई, जबकि देवराज धरना स्थल पर अनशन पर बैठ गया।

सुबह ही किया निर्णय
शाम को चार बजे आनन-फानन में धरना स्थल पर शादी का मण्डप सजाया गया। बड़ी संख्या में लोग धरना स्थल पहुंचने लगे। आसपास के गांवों की गुर्जर महिलाएं भी शादी में शामिल हुई। समाज के लोगों ने दूल्हे की शादी की रस्में शुरू की। महिलाओं ने दूल्हे को उपटन लगाकर नहलाया। दूल्हे ने नए कपड़े नहीं पहन कर पहले से पहने हुए पुराने कपड़े में शादी की इच्छा जताई। महिलाओं ने दूल्हे को जुआरी में रुपए देने की रस्म की।

महिलाओं ने मंंगलाचार गीत गाए। कन्या पक्ष के पहुंचने पर दुल्हन को मण्डप में बिठाया गया। धरना स्थल पर ही कन्या पक्ष के लोगों ने दूल्हे की अगवानी की। मण्डप से पहले बनाए गए तोरण द्वार पर दूल्हे का स्वागत किया। तथा तोरण मारने के बाद वर-वधु ने एक दूसरे को वरमाला डाली।

इसके बाद मण्डप में अग्नि की साक्षी में पाणीग्रहण संस्कार की रस्में शुरू हुई। वधु के माता-पिता ने दूल्हा व दुल्हन के पीले हाथ की रस्म की। इसके साथ वर व वधु ने अग्नि के साथ फेरे लिए। इस दौरान मौजूद लोगों को शर्बत पिलाया गया।

तब तक जारी रखेंगे धरना
सात फेरे के बाद दूल्हा व दुल्हन ने समाज के लोगों को संबोधित करते हुए कहा सरकार चार हजार अभ्यर्थियों को जब तक नियुक्ति नहीं देगी तब तक अनशन जारी रहेगा। दुल्हन ममता सिंह बैंसला ने भी जल्द नियुक्ति नहीं मिलने पर अनशन पर बैठने की घोषणा की। इसके बाद दुल्हन के साथ कन्या पक्ष गुढाआशिकपुरा के लिए रवाना हो गए तथा देवराज धरना स्थल पर ही अनशन पर बैठा रहा।

ये भी रहे साक्षी
शादी के दौरान गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के उपाध्यक्ष भूरा भगत, गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के प्रवक्ता हिम्मत सिंह पाड़ली, श्रीराम बैंसला, राजस्थान गुर्जर महासभा के प्रदेशाध्यक्ष मनफूल तुंगड़, जिलाध्यक्ष रामचन्द्र खूंटला, पूर्व सरपंच मलखान सिंह बासड़ा, लक्ष्मणसिंह छावड़ी खानपुर, देव सेना जिलाध्यक्ष जलसिंह कसाना, भारतीय किसान गुर्जर महासभा के प्रदेशाध्यक्ष गिरिराज घुरैया, विक्रम मण्डावर, रामप्रसाद पटेलवाला, धाराङ्क्षसह बासड़ा, मुकेश बासड़ा, विश्वम्बर बासड़ा, एडवोकेट राजाराम, अभ्यर्थी खेमङ्क्षसह छावड़ी, जोगिंदर भाटी सहित हज़ारों लोग मौजूद थे।


दूसरे भाई ने गांव में ही फेरे
झूपड़ीन निवासी पूर्व सरपंच रामजीलाल चाड के बेटे देवराज व देवऋषि की गुढाआशिकपुरा निवासी विश्राम बैंसला की बेटी ममता व माया के साथ शादी हुई है।

धरना स्थल पर देवराज की शादी हुई तथा छोटा भाई देवऋषि बारात लेकर गुढाआशिकपुरा पहुंचा है। धरना स्थल पर देवराज की शादी के बाद दुल्हन ममता के साथ कन्या पक्ष ने गुढाआशिकपुरा पहुंचा। वहां पर देवऋषि व माया के शादी की रस्में हुई।

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

महेन्द्र गुर्जर (महेन्द्र फौजी) के एनकाउंटर की वजह से अलग हुए थे सपा-बसपा

महेंद्र गुर्जर (महेंद्र फौजी) के एनकाउंटर की वजह से अलग हुए थे एसपी-बीएसपी

गुर्जर के एनकाउंटर के बाद ही शुरू हुई थी कांशीराम-मुलायम सिंह में तनातनी।
जाति, अंडरवर्ल्ड और राजनीति का मकड़जाल पश्चिम उत्तप्रदेश की सियासत की नियति तय करने में निर्णायक भूमिका निभाता आया है. और, 1994 के अप्रैल में बुलंदशहर की पुलिस ने अपने कारनामों के लिए दुर्दांत एक गुर्जर को जब मार दिया गया।
जो हुआ वह सचमुच बड़ा हैरतअंगेज था. एक ऐसे इलाके में जहां अपने जातिगत जुड़ाव के दम पर गैंगस्टर दबदबा जमाने की जंग छेड़े रहते हैं, महेन्द्र फौजी ने अपना आतंक कायम कर रखा था. फौजी गुर्जर जाति का था और यादव तथा त्यागी जाति के गैंगस्टरों की आंख में खटक रहा था.
एक एनकाउंटर ने एसपी-बीएसपी के रिश्तों में खटास डाली
बाबरी-मस्जिद के विध्वंस के बाद के दिनों में  सियासत ने एक नई करवट ली थी. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज के बीच गठबंधन कामयाब रहा और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने. मायावती बीएसपी की महासचिव थीं और हर सियासी फैसले पर कद्दावर कांशीराम के असर की छाया थी. बीएसपी का दावा था कि गुर्जरों के बीच उसे अच्छा-खासा समर्थन है.

एक संयोग यह भी रहा कि बुलंदशहर पुलिस ने गैंगस्टर को जिस वक्त मार गिराया उस समय हस्तिनापुर विधानसभा सीट पर यूपी-चुनाव होने वाले थे. बीएसपी वह चुनाव हार गई, जीत बीजेपी को मिली. गुर्जरों ने बीएसपी के उम्मीदवार सिद्धार्थ को वोट नहीं डाला और शायद मायावती को यही बात नागवार गुजरी.
पढे़ं-गूगल के पार: 1989 का मर्डर जिसने जाट-मुसलमान रिश्तों को गढ़ा
गैंगस्टर के एनकाउंटर से लखनऊ में तूफान मच गया. कांशीराम और मायावती ने एसएसपी(तत्कालीन) ओपी सिंह को हटाने की मांग कर दी. आरोप लगाया कि एनकाउंटर फर्जी था और गलत वक्त पर हुआ. कांशीराम ने मुलायम सिंह यादव पर एसपी को हटाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया लेकिन मुख्यमंत्री टस से मस नहीं हुए. इस जोर-आजमाइश से एसपी-बीएसपी के रिश्तों में तनातनी आई.
खैर, गठबंधन जारी रहा लेकिन कुछ ही दिन बाद एसपी-बीएसपी के रिश्तों पर एक बार फिर से आंच आई. बुलंदशहर के एक राजपूत-बहुल गांव में आपराधिक पृष्ठभूमि के चार दलितों को गांववालों ने मार डाला.
इस घटना के बाद कांशीराम और मायावती ने एक प्रेस-कांफ्रेस की और कहा कि जिले का पुलिस प्रमुख दलित विरोधी है. कांशीराम की मांग थी 'ओपी सिंह को तुरंत हटाया जाए.' आखिरकार, मुलायम सिंह को झुकना पड़ा, पुलिस-अधिकारी का तबादला हुआ लेकिन मुलायम सिंह ने उसके निलंबन की बात नहीं मानी.
लेकिन यही वक्त एसपी-बीएसपी के मजबूत जान पड़ रहे सामाजिक आधार के बिखराव का भी था. बुलंदशहर की घटना के चंद रोज के भीतर इलाहाबाद के एक गांव दौना में कुर्मी जाति के गुंडों ने एक दलित महिला को निर्वस्त्र कर घुमाया.

कांशीराम ने मुलायम सिंह पर किया था चुनावी हमला

कांशीराम ने इस घटना को सीधे अपने ऊपर हमला मानते हुए इलाहाबाद की एक जनसभा में मुलायम सिंह को सरेआम खरी-खोटी सुनायी. कांशीराम ने चेताया कि 'हम गठबंधन को इस तरह तो नहीं चलने देंगे.' बार-बार की घुड़की से तंग आए मुलायम सिंह को अब लगने लगा था कि बात बर्दाश्त के बाहर जा रही है.
लखनऊ की फिजां में परेशानियों की सुगबुगाहट थी. माहौल सियासी साजिश और सेंधमारी का बन रहा था. हवा में यह आरोप तैर रहा था कि मुलायम सिंह यादव बीएसपी को तोड़ने की फिराक में हैं और जल्दी ही बीएसपी का एक बड़ा धड़ा दलबदल करेगा.
मायावती ने मुख्यमंत्री बनते ही ओपी सिंह को निलंबित कर दिया
2 जून 1995 को मायावती ने मुलायम सिंह यादव के पांव के नीचे से सत्ता की कालीन खींचते हुए समर्थन वापस ले लिया. इसके बाद ही स्टेट गेस्ट हाउस में ठहरी मायावती पर समाजवादी पार्टी के गुंडों के धावा बोलने की घटना हुई. यह प्रकरण सभी जानते हैं.
लेकिन यह बात अनजानी रह जाती है कि स्टेट गेस्ट हाउस पर हुए हमले का एक रिश्ता बुलंदशहर में हुई एन्काउंटर की घटना से भी है. ओपी सिंह को कांशीराम और मायावती के दबाव में बुलंदशहर से हटाकर लखनऊ में एसएसपी(सीनियर सुपरिटेन्डेन्ट ऑफ पुलिस) बनाया गया था. ओपी सिंह की तैनाती से बीएसपी के इस भय की पुष्टी हुई कि मायावती को नुकसान पहुंचाने के लिए उसे जान-बूझकर लाया गया था.
हालात जब काबू में आए और मायावती मुख्यमंत्री बनी तो पहला काम उन्होंने ओपी सिंह को निलंबित करने का किया. मजे की बात यह भी है कि ओपी सिंह की कानूनी लड़ाई अदालत में एक ब्राह्मण वकील सतीश मिश्र की अगुवाई में लड़ी गई.
यही सतीश मिश्र बाद में बीएसपी सुप्रीमो के खासम-खास बने. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि महेन्द्र फौजी के पुलिस एन्काउन्टर की घटना का असर दूरगामी साबित हुआ और इसने सूबे की सियासत को एक खास शक्ल दी. ऐसी मिसाल सूबे में शायद ही कोई दूसरी हो।।

सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

मोदी जी मेरठ आते आते मेरठ का इतिहास भूल गये

मोदी जी मेरठ आते आते मेरठ का इतिहास भूल गये
1857 की क्रांति (गुर्जर क्रांति)  देशभक्ति से सम्बंधित है गुर्जर जाति का इतिहास
1857 की जनक्रान्ति के जनक धन सिंह कोतवाल

इतिहास की पुस्तकें कहती हैं कि 1857 की क्रान्ति का प्रारम्भ '10 मई 1857' की संध्या को मेरठ में हुआ। हम तार्किक आधार पर कह सकते हैं कि जब 1857 की क्रान्ति का आरम्भ '10 मई 1857' को 'मेरठ' से माना जाता है, तो क्रान्ति की शुरूआत करने का श्रेय भी उसी व्यक्ति को दिया जा सकता है जिसने 10 मई 1857 के दिन मेरठ में घटित क्रान्तिकारी घटना में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो।

ऐसी सक्रिय क्रान्तिकारी भूमिका अमर शहीद धन सिंह कोतवाल (गोत्र चपराणा) ने 10 मई 1857 के दिन मेरठ में निभाई थी। 10 मई 1857 को मेरठ में विद्रोही सैनिकों और पुलिस फोर्स ने अंग्रेजों के विरूद्ध साझा मोर्चा गठित कर क्रान्तिकारी घटनाओं को अंजाम दिया।
1• सैनिकों के विद्रोह की खबर फैलते ही मेरठ की शहरी जनता और आस-पास के गांव विशेषकर पांचली, घाट, नंगला, गगोल इत्यादि के हजारों ग्रामीण मेरठ की सदर कोतवाली क्षेत्र में जमा हो गए। इसी कोतवाली में धन सिंह कोतवाल (प्रभारी) के पद पर कार्यरत थे।
2 •मेरठ की पुलिस बागी हो चुकी थी। धन सिंह कोतवाल क्रान्तिकारी भीड़ (सैनिक, मेरठ के शहरी, पुलिस और किसान) में एक प्राकृतिक नेता के रूप में उभरे। उनका आकर्षक व्यक्तित्व, उनका स्थानीय होना, (वह मेरठ के निकट स्थित गांव पांचली के रहने वाले थे), पुलिस में उच्च पद पर होना और स्थानीय क्रान्तिकारियों का उनको विश्वास प्राप्त होना कुछ ऐसे कारक थे जिन्होंने धन सिंह को 10 मई 1857 के दिन मेरठ की क्रान्तिकारी जनता के नेता के रूप में उभरने में मदद की। उन्होंने क्रान्तिकारी भीड़ का नेतृत्व किया और रात दो बजे मेरठ जेल पर हमला कर दिया। जेल तोड़कर 836 कैदियों को छुड़ा लिया और जेल में आग लगा दी।
3• जेल से छुड़ाए कैदी भी क्रान्ति में शामिल हो गए। उससे पहले पुलिस फोर्स के नेतृत्व में क्रान्तिकारी भीड़ ने पूरे सदर बाजार और कैंट क्षेत्र में क्रान्तिकारी घटनाओं को अंजाम दिया। रात में ही विद्रोही सैनिक दिल्ली कूच कर गए और विद्रोह मेरठ के देहात में फैल गया।

एक ऐतिहासिक भ्रान्ति के कारण शहीद मंगल पाण्डे का नाम मेरठ से जोड़ दिया जाता है। किन्तु सत्य यह है कि मंगल पाण्डे 10 मई, 1857 को मेरठ में मौजूद नहीं थे, वे तो 8 अप्रैल, 1857 को बैरकपुर, बंगाल में शहीद हो गए थे। मंगल पाण्डे ने चर्बी वाले कारतूसों के विरोध में अपने एक अफसर को 29 मार्च, 1857 को बैरकपुर छावनी, बंगाल में गोली से उड़ा दिया था। जिसके पश्चात उन्हें गिरफ्तार कर बैरकपुर (बंगाल) में 8 अप्रैल को फासी दे दी गई थी। 10 मई, 1857 को मेरठ में हुए जनक्रान्ति के विस्फोट से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है।

क्रान्ति के दमन के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने 10 मई, 1857 को मेरठ मे हुई क्रान्तिकारी घटनाओं में पुलिस की भूमिका की जांच के लिए मेजर विलियम्स की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गई।
4 •मेजर विलियम्स ने उस दिन की घटनाओं का भिन्न-भिन्न गवाहियों के आधार पर गहन विवेचन किया तथा इस सम्बन्ध में एक स्मरण-पत्र तैयार किया, जिसके अनुसार उन्होंने मेरठ में जनता की क्रान्तिकारी गतिविधियों के विस्फोट के लिए धन सिंह कोतवाल को मुख्य रूप से दोषी ठहराया, उसका मानना था कि यदि धन सिंह कोतवाल ने अपने कर्तव्य का निर्वाह ठीक प्रकार से किया होता तो संभवतः मेरठ में जनता को भड़कने से रोका जा सकता था।
5 •धन सिंह कोतवाल को पुलिस नियंत्रण के छिन्न-भिन्न हो जाने के लिए दोषी पाया गया। क्रान्तिकारी घटनाओं से दमित लोगों ने अपनी गवाहियों में सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि धन सिंह कोतवाल क्योंकि स्वयं गूजर है इसलिए उसने क्रान्तिकारियों, जिनमें गूजर बहुसंख्या में थे, को नहीं रोका। उन्होंने धन सिंह पर क्रान्तिकारियों को खुला संरक्षण देने का आरोप भी लगाया।
6 • एक गवाही के अनुसार क्रान्तिकरियों ने कहा कि धन सिंह कोतवाल ने उन्हें स्वयं आस-पास के गांव से बुलाया है।

यदि मेजर विलियम्स द्वारा ली गई गवाहियों का स्वयं विवेचन किया जाये तो पता चलता है कि 10 मई, 1857 को मेरठ में क्रांति का विस्फोट काई स्वतः विस्फोट नहीं वरन् एक पूर्व योजना के तहत एक निश्चित कार्यवाही थी, जो परिस्थितिवश समय पूर्व ही घटित हो गई। नवम्बर 1858 में मेरठ के कमिश्नर एफ0 विलियम द्वारा इसी सिलसिले से एक रिपोर्ट नोर्थ - वैस्टर्न प्रान्त (आधुनिक उत्तर प्रदेश) सरकार के सचिव को भेजी गई। रिपोर्ट के अनुसार मेरठ की सैनिक छावनी में ”चर्बी वाले कारतूस और हड्डियों के चूर्ण वाले आटे की बात“ बड़ी सावधानी पूर्वक फैलाई गई थी। रिपोर्ट में अयोध्या से आये एक साधु की संदिग्ध भूमिका की ओर भी इशारा किया गया था।
8• विद्रोही सैनिक, मेरठ शहर की पुलिस, तथा जनता और आस-पास के गांव के ग्रामीण इस साधु के सम्पर्क में थे। मेरठ के आर्य समाजी, इतिहासज्ञ एवं स्वतन्त्रता सेनानी आचार्य दीपांकर के अनुसार यह साधु स्वयं दयानन्द जी थे और वही मेरठ में 10 मई, 1857 की घटनाओं के सूत्रधार थे।

मेजर विलियम्स को दो गयी गवाही के अनुसार कोतवाल स्वयं इस साधु से उसके सूरजकुण्ड स्थित ठिकाने पर मिले थे।
9 • हो सकता है ऊपरी तौर पर यह कोतवाल की सरकारी भेंट हो, परन्तु दोनों के आपस में सम्पर्क होने की बात से इंकार नहीं किया जा सकता। वास्तव में कोतवाल सहित पूरी पुलिस फोर्स इस योजना में साधु (सम्भवतः स्वामी दयानन्द) के साथ देशव्यापी क्रान्तिकारी योजना में शामिल हो चुकी थी। 10 मई को जैसा कि इस रिपोर्ट में बताया गया कि सभी सैनिकों ने एक साथ मेरठ में सभी स्थानों पर विद्रोह कर दिया। ठीक उसी समय सदर बाजार की भीड़, जो पहले से ही हथियारों से लैस होकर इस घटना के लिए तैयार थी, ने भी अपनी क्रान्तिकारी गतिविधियां शुरू कर दीं। धन सिंह कोतवाल ने योजना के अनुसार बड़ी चतुराई से ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार पुलिस कर्मियों को कोतवाली के भीतर चले जाने और वहीं रहने का आदेश दिया।
10 • आदेश का पालन करते हुए अंगे्रजों के वफादार पिट्ठू पुलिसकर्मी क्रान्ति के दौरान कोतवाली में ही बैठे रहे। इस प्रकार अंग्रेजों के वफादारों की तरफ से क्रान्तिकारियों को रोकने का प्रयास नहीं हो सका, दूसरी तरफ उसने क्रान्तिकारी योजना से सहमत सिपाहियों को क्रान्ति में अग्रणी भूमिका निभाने का गुप्त आदेश दिया, फलस्वरूप उस दिन कई जगह पुलिस वालों को क्रान्तिकारियों की भीड़ का नेतृत्व करते देखा गया।
11• धन सिंह कोतवाल अपने गांव पांचली और आस-पास के क्रान्तिकारी गूजर बाहुल्य गांव घाट, नंगला, गगोल आदि की जनता के सम्पर्क में थे, धन सिंह कोतवाल का संदेश मिलते ही हजारों की संख्या में गूजर क्रान्तिकारी रात में मेरठ पहुंच गये। मेरठ के आस-पास के गांवों में प्रचलित किवंदन्ती के अनुसार इस क्रान्तिकारी भीड़ ने धन सिंह कोतवाल के नेतृत्व में देर रात दो बजे जेल तोड़कर 836 कैदियों को छुड़ा लिया
12 • और जेल को आग लगा दी। मेरठ शहर और कैंट में जो कुछ भी अंग्रेजों से सम्बन्धित था उसे यह क्रान्तिकारियों की भीड़ पहले ही नष्ट कर चुकी थी।

उपरोक्त वर्णन और विवेचना के आधार पर हम निःसन्देह कह सकते हैं कि धन सिंह कोतवाल ने 10 मई, 1857 के दिन मेरठ में मुख्य भूमिका का निर्वाह करते हुए क्रान्तिकारियों को नेतृत्व प्रदान किया था।

1857 की क्रान्ति की औपनिवेशिक व्याख्या, (ब्रिटिश साम्राज्यवादी इतिहासकारों की व्याख्या), के अनुसार 1857 का गदर मात्र एक सैनिक विद्रोह था जिसका कारण मात्र सैनिक असंतोष था। इन इतिहासकारों का मानना है कि सैनिक विद्रोहियों को कहीं भी जनप्रिय समर्थन प्राप्त नहीं था। ऐसा कहकर वह यह जताना चाहते हैं कि ब्रिटिश शासन निर्दोष था और आम जनता उससे सन्तुष्ट थी। अंग्रेज इतिहासकारों, जिनमें जौन लोरेंस और सीले प्रमुख हैं ने भी 1857 के गदर को मात्र एक सैनिक विद्रोह माना है, इनका निष्कर्ष है कि 1857 के विद्रोह को कही भी जनप्रिय समर्थन प्राप्त नहीं था, इसलिए इसे स्वतन्त्रता संग्राम नहीं कहा जा सकता। राष्ट्रवादी इतिहासकार वी0 डी0 सावरकर और सब-आल्टरन इतिहासकार रंजीत गुहा ने 1857 की क्रान्ति की साम्राज्यवादी व्याख्या का खंडन करते हुए उन क्रान्तिकारी घटनाओं का वर्णन किया है, जिनमें कि जनता ने क्रान्ति में व्यापक स्तर पर भाग लिया था, इन घटनाओं का वर्णन मेरठ में जनता की सहभागिता से ही शुरू हो जाता है। समस्त पश्चिम उत्तर प्रदेश के बन्जारो, रांघड़ों और गूजर किसानों ने 1857 की क्रान्ति में व्यापक स्तर पर भाग लिया। पूर्वी उत्तर प्रदेश में ताल्लुकदारों ने अग्रणी भूमिका निभाई। बुनकरों और कारीगरों ने अनेक स्थानों पर क्रान्ति में भाग लिया। 1857 की क्रान्ति के व्यापक आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक कारण थे और विद्रोही जनता के हर वर्ग से आये थे, ऐसा अब आधुनिक इतिहासकार सिद्ध कर चुके हैं। अतः 1857 का गदर मात्र एक सैनिक विद्रोह नहीं वरन् जनसहभागिता से पूर्ण एक राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम था। परन्तु 1857 में जनसहभागिता की शुरूआत कहाँ और किसके नेतृत्व में हुई ? इस जनसहभागिता की शुरूआत के स्थान और इसमें सहभागिता प्रदर्शित वाले लोगों को ही 1857 की क्रान्ति का जनक कहा जा सकता है। क्योंकि 1857 की क्रान्ति में जनता की सहभागिता की शुरूआत धन सिंह कोतवाल के नेतृत्व में मेरठ की जनता ने की थी। अतः ये ही 1857 की क्रान्ति के जनक कहे जा सकते हैं।

10, मई 1857 को मेरठ में जो महत्वपूर्ण भूमिका धन सिंह और उनके अपने ग्राम पांचली के भाई बन्धुओं ने निभाई उसकी पृष्ठभूमि में अंग्रेजों के जुल्म की दास्तान छुपी हुई है। ब्रिटिश साम्राज्य की औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की कृषि नीति का मुख्य उद्देश्य सिर्फ अधिक से अधिक लगान वसूलना था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अंग्रेजों ने महलवाड़ी व्यवस्था लागू की थी, जिसके तहत समस्त ग्राम से इकट्ठा लगान तय किया जाता था और मुखिया अथवा लम्बरदार लगान वसूलकर सरकार को देता था। लगान की दरें बहुत ऊंची थी, और उसे बड़ी कठोरता से वसूला जाता था। कर न दे पाने पर किसानों को तरह-तरह से बेइज्जत करना, कोड़े मारना और उन्हें जमीनों से बेदखल करना एक आम बात थी, किसानों की हालत बद से बदतर हो गई थी। धन सिंह कोतवाल भी एक किसान परिवार से सम्बन्धित थे। किसानों के इन हालातों से वे बहुत दुखी थे। धन सिंह के पिता पांचली ग्राम के मुखिया थे, अतः अंग्रेज पांचली के उन ग्रामीणों को जो किसी कारणवश लगान नहीं दे पाते थे, उन्हें धन सिंह के अहाते में कठोर सजा दिया करते थे, बचपन से ही इन घटनाओं को देखकर धन सिंह के मन में आक्रोष जन्म लेने लगा।13 ग्रामीणों के दिलो दिमाग में ब्रिटिष विरोध लावे की तरह धधक रहा था।

1857 की क्रान्ति में धन सिंह और उनके ग्राम पांचली की भूमिका का विवेचन करते हुए हम यह नहीं भूल सकते कि धन सिंह गूजर जाति में जन्में थे, उनका गांव गूजर बहुल था। 1707 ई0 में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात गूजरों ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में अपनी राजनैतिक ताकत काफी बढ़ा ली थी।14 लढ़ौरा, मुण्डलाना, टिमली, परीक्षितगढ़, दादरी, समथर-लौहा गढ़, कुंजा बहादुरपुर इत्यादि रियासतें कायम कर वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक गूजर राज्य बनाने के सपने देखने लगे थे।15 1803 में अंग्रेजों द्वारा दोआबा पर अधिकार करने के वाद गूजरों की शक्ति क्षीण हो गई थी, गूजर मन ही मन अपनी राजनैतिक शक्ति को पुनः पाने के लिये आतुर थे, इस दषा में प्रयास करते हुए गूजरों ने सर्वप्रथम 1824 में कुंजा बहादुरपुर के ताल्लुकदार विजय सिंह और कल्याण सिंह उर्फ कलवा गूजर के नेतृत्व में सहारनपुर में जोरदार विद्रोह किये।16 पश्चिमी उत्तर प्रदेष के गूजरों ने इस विद्रोह में प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया परन्तु यह प्रयास सफल नहीं हो सका। 1857 के सैनिक विद्रोह ने उन्हें एक और अवसर प्रदान कर दिया। समस्त पश्चिमी उत्तर प्रदेष में देहरादून से लेकिन दिल्ली तक, मुरादाबाद, बिजनौर, आगरा, झांसी तक। पंजाब, राजस्थान से लेकर महाराष्ट्र तक के गूजर इस स्वतन्त्रता संग्राम में कूद पड़े। हजारों की संख्या में गूजर शहीद हुए और लाखों गूजरों को ब्रिटेन के दूसरे उपनिवेषों में कृषि मजदूर के रूप में निर्वासित कर दिया। इस प्रकार धन सिंह और पांचली, घाट, नंगला और गगोल ग्रामों के गूजरों का संघर्ष गूजरों के देशव्यापी ब्रिटिष विरोध का हिस्सा था। यह तो बस एक शुरूआत थी।

1857 की क्रान्ति के कुछ समय पूर्व की एक घटना ने भी धन सिंह और ग्रामवासियों को अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित किया। पांचली और उसके निकट के ग्रामों में प्रचलित किंवदन्ती के अनुसार घटना इस प्रकार है, ”अप्रैल का महीना था। किसान अपनी फसलों को उठाने में लगे हुए थे। एक दिन करीब 10 11 बजे के आस-पास बजे दो अंग्रेज तथा एक मेम पांचली खुर्द के आमों के बाग में थोड़ा आराम करने के लिए रूके। इसी बाग के समीप पांचली गांव के तीन किसान जिनके नाम मंगत सिंह, नरपत सिंह और झज्जड़ सिंह (अथवा भज्जड़ सिंह) थे, कृषि कार्यो में लगे थे। अंग्रेजों ने इन किसानों से पानी पिलाने का आग्रह किया। अज्ञात कारणों से इन किसानों और अंग्रेजों में संघर्ष हो गया। इन किसानों ने अंग्रेजों का वीरतापूर्वक सामना कर एक अंग्रेज और मेम को पकड़ दिया। एक अंग्रेज भागने में सफल रहा। पकड़े गए अंग्रेज सिपाही को इन्होंने हाथ-पैर बांधकर गर्म रेत में डाल दिया और मेम से बलपूर्वक दायं हंकवाई। दो घंटे बाद भागा हुआ सिपाही एक अंग्रेज अधिकारी और 25-30 सिपाहियों के साथ वापस लौटा। तब तक किसान अंग्रेज सैनिकों से छीने हुए हथियारों, जिनमें एक सोने की मूठ वाली तलवार भी थी, को लेकर भाग चुके थे। अंग्रेजों की दण्ड नीति बहुत कठोर थी, इस घटना की जांच करने और दोषियों को गिरफ्तार कर अंग्रेजों को सौंपने की जिम्मेदारी धन सिंह के पिता, जो कि गांव के मुखिया थे, को सौंपी गई। ऐलान किया गया कि यदि मुखिया ने तीनों बागियों को पकड़कर अंग्रेजों को नहीं सौपा तो सजा गांव वालों और मुखिया को भुगतनी पड़ेगी। बहुत से ग्रामवासी भयवश गाँव से पलायन कर गए। अन्ततः नरपत सिंह और झज्जड़ सिंह ने तो समर्पण कर दिया किन्तु मंगत सिंह फरार ही रहे। दोनों किसानों को 30-30 कोड़े और जमीन से बेदखली की सजा दी गई। फरार मंगत सिंह के परिवार के तीन सदस्यों के गांव के समीप ही फांसी पर लटका दिया गया। धन सिंह के पिता को मंगत सिंह को न ढूंढ पाने के कारण छः माह के कठोर कारावास की सजा दी गई। इस घटना ने धन सिंह सहित पांचली के बच्चे-बच्चे को विद्रोही बना दिया।17 जैसे ही 10 मई को मेरठ में सैनिक बगावत हुई धन सिंह और ने क्रान्ति में सहभागिता की शुरूआत कर इतिहास रच दिया।

क्रान्ति मे अग्रणी भूमिका निभाने की सजा पांचली व अन्य ग्रामों के किसानों को मिली। मेरठ गजेटियर के वर्णन के अनुसार 4 जुलाई, 1857 को प्रातः चार बजे पांचली पर एक अंग्रेज रिसाले ने तोपों से हमला किया। रिसाले में 56 घुड़सवार, 38 पैदल सिपाही और 10 तोपची थे। पूरे ग्राम को तोप से उड़ा दिया गया। सैकड़ों किसान मारे गए, जो बच गए उनमें से 46 लोग कैद कर लिए गए और इनमें से 40 को बाद में फांसी की सजा दे दी गई।18 आचार्य दीपांकर द्वारा रचित पुस्तक स्वाधीनता आन्दोलन और मेरठ के अनुसार पांचली के 80 लोगों को फांसी की सजा दी गई थी। पूरे गांव को लगभग नष्ट ही कर दिया गया। ग्राम गगोल के भी 9 लोगों को दशहरे के दिन फाँसी की सजा दी गई और पूरे ग्राम को नष्ट कर दिया। आज भी इस ग्राम में दश्हरा नहीं मनाया जाता।
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संदर्भ एवं टिप्पणी

1. मेरठ डिस्ट्रिक्ट गजेटेयर, गवर्नमेन्ट प्रेस, 1963 पृष्ठ संख्या 52
2. वही
3. पांचली, घाट, गगोल आदि ग्रामों में प्रचलित किवदन्ती, बिन्दु क्रमांक 191, नैरेटिव ऑफ इवेन्टस अटैन्डिग द आऊट ब्रैक ऑफ डिस्टरबैन्सिस एण्ड दे रेस्टोरेशन ऑफ औथरिटी इन डिस्ट्रिक्ट मेरठ 1857-58, नवम्बर 406, दिनांक 15 नवम्बर 1858, फ्राम एफ0 विलयम्बस म्.59 सैकेट्री टू गवर्नमेंट नार्थ-वैस्टर्न प्राविन्स, इलाहाबाद, राष्ट्रीय अभिलेखागार, दिल्ली। आचार्य दीपांकर, स्वाधीनता संग्राम और मेरठ, 1993 पृष्ठ संख्या 143
4. वही, नैरेटिव इन डिस्ट्रिक्ट मेरठ।
5. मैमोरेन्डम ऑन द म्यूंटनी एण्ड आऊटब्रेक ऐट मेरठ इन मई 1857, बाई मेजर विलयम्स, कमिश्नर ऑफ द मिलेट्री पुलिस, नार्थ-वेस्टर्न प्राविन्सिस, इलाहाबाद, 15 नवम्बर 1858; जे0ए0बी0 पामर, म्यूटनी आऊटब्रेक एट मेरठ, पृष्ठ संख्या 90-91।
6. डेपाजिशन नम्बर 54, 56, 59 एवं 60, आफ डेपाजिशन टेकन एट मेरठ बाई जी0 डबल्यू0 विलयम्बस, वही म्यूटनी नैरेटिव इन डिस्ट्रिक्ट मेरठ।
7. वही, डेपाजिशन नम्बर 66
8. वही, बिन्दु क्रमांक 152, म्यूटनी नैरेटिव इन मेरठ डिस्ट्रिक्ट।
9. वहीं, डेपाजिशन नम्बर 8
10. वही, सौन्ता सिंह की गवाही।
11. वही, डेपाजिशन संख्या 22, 23, 24, 25 एवं 26।
12. वही, बिन्दु क्रमांक 191, नैरेटिव इन मेरठ डिस्ट्रिक्ट; पांचली, नंगला, घाट, गगोल आदि ग्रामों में प्रचलित किंवदन्ती।
13. वही किंवदन्ती।
14. नेविल, सहारनपुर ए गजेटेयर, 1857 की घटना से सम्बंधित पृष्ठ।
15. मेरठ के मजिस्ट्रेट डनलप द्वारा मेजर जनरल हैविट कमिश्नर मेरठ को 28 जून 1857 को लिखा पत्र, एस0ए0ए0 रिजवी, फ्रीडम स्ट्रगल इन उत्तर प्रदेश्, खण्ड टए लखनऊ, 1960 पृष्ठ संख्या 107-110।
16. नेविल, वही; एच0जी0 वाटसन, देहरादून गजेटेयर के सम्बन्धित पृष्ठ।
17. वही, किंवदन्ती यह किवदन्ती पांचली ग्राम के खजान सिंह, उम्र 90 वर्ष के साक्षात्कार पर आधारित है।
18. बिन्दु क्रमांक 265, 266, 267, वही, नैरटिव इन डिस्ट्रिक्ट मेरठ।

संदर्भ ग्रन्थ

1. आचार्य दीपांकर, स्वाधीनता संग्राम और मेरठ, जनमत प्रकाषन, मेरठ 1993
2. मेरठ डिस्ट्रिक्ट गजेटेयर, गवर्नमेनट प्रैस, इलाहाबाद, 1963
3. मयराष्ट्र मानस, मेरठ।
4. रमेश चन्द्र मजूमदार, द सिपोय म्यूटनी एण्ड रिवोल्ट ऑफ 1857
5. एस0 बी0 चैधरी, सिविल रिबैलयन इन इण्डियन म्यूटनीज 1857-59
6. एस0 एन0-सेन, 1857
7. पी0सी0 जोशी रिबैलयन 1857।
8. एरिक स्ट्रोक्स, द पीजेण्ट एण्ड द राज।
9. जे0ए0बी0 पामर, द म्यूटनी आउटब्रैक एट मेरठ।
सभी गुर्जरो से अपील है की दिखा दो एकता उस सरकार को जिसे ना दिखाई देता है ना सुनाई देता है मेरठ के क्रांति देश की आजादी का प्रतीक है उन सभी परिवारों सम्मान मिलना चाहिये