सोमवार, 31 जुलाई 2017

यह कोई आलोचना नहीं है!

यह कोई आलोचना नहीं है!

आजकल देखने में आता है कि हमारे अधिकांश गुर्जर संगठन नवनिर्वाचित जन प्रतिनिधियों के स्वागत कार्यक्रमों का लगातार एक के बाद एक आयोजन करने लगते हैं. उसी कार्यक्रम में गुर्जर प्रतिभाओं का सम्मान भी किया जाता है. जिन बच्चों ने पढाई में अच्छे अंक प्राप्त किये हैं, उन्हें भी सम्मानित कर दिया जाता है. और फिर होते हैं भाषण जिनमें या तो वक्ता गुर्जर इतिहास बताने में लग जाता है या फिर जाने अनजाने आत्म प्रतिष्ठा के समुद्र में गोते लगाने लगता है.

ऐसे ही एक कार्यक्रम में मुझे एक बच्चा मिला था जिसने अपना दर्द मेरे साथ शेयर किया था. उस बच्चे ने 10वीं कक्षा में जिले में टॉप किया था जिसकी वजह से उसे लगभग एक दर्जन कार्यक्रमों में सम्मानित किया जा  चुका था. उसने बताया मैं इतनी दूर से धक्के खाता हुआ अपने खर्चे से कार्यक्रम में पहुँचता हूँ. अपना पढाई का समय ख़राब करता हूँ. जबकि यहाँ  एक सर्टिफिकेट और ट्राफी देकर विदा कर दिया जाता है. हाई स्कूल में यदि गरीबी के श्राप को झेलते हुए मैंने टाप किया तो अपनी मेहनत से. पढाई के समय मदद के लिए न तो कोई संगठन सामने आया और न ही कोई व्यक्ति. भविष्य में मेरी या मेरे जैसे अन्य छात्र अपनी पढाई को आगे कैसे जारी रखेंगे, क्या किसी को कोई चिंता है? दिल्ली में जब कोचिंग के लिए आते हैं तो अपनी जमीन को बेच कर या गिरवी रख कर आते हैं ताकि खर्चा पूरा कर सकें. उसने   सवाल किया कि क्यूं नहीं ये संगठन आगे आकर कुछ ठोस काम करते? उसकी बातों ने मुझे निरुत्तर कर दिया.

केपीसिंह गुर्जर
राष्ट्रीय महासचिव- भारतीय गुर्जर परिषद

आखिर कौन सा नेता, पार्टी या संगठन दिलाएगी वंचितों को न्याय और कब?

आखिर कौन सा नेता , पार्टी या संगठन  दिलाएगी वंचितों को न्याय और कब ??

1 . कौन सा नेता, पार्टी या संगठन  कराएगा ओ.बी.सी. का  विभाजन ?

2 . कौन सा नेता, पार्टी भिजवाएगी एथनोग्राफिक रिपोर्ट केंद्र सरकार को गूजर, बंजारा व गाड़िया लोहार को अनुसूचित जनजाति में शामिल करवाने के लिए  ?

3 . S .B .C . का केस सुप्रीम कोर्ट में है .. क्या गुर्जर समाज मजबूत पैरवी के लिए हरीश साल्वे या जेठमलानी जैसा नामी वकील खड़ा करेगा या सरकार भरोसे रहेगा ? क्योकि सर्वोच्च न्यायलय का निर्णय अंतिम होगा |

नोट: ऑनलाइन जर्नल में डा. सुशील भाटी द्वारा लिखित एथनोग्राफिक रिपोर्ट '' गूजर ए बैकवर्ड ट्राइब'' का संदर्भ लेने के लिए लिंक निम्न है :

www.google.co.in/?gfe_rd=cr&ei=Yf-0WO7INqL98weL2qSADQ&gws_rd=ssl#q=gujar+a+backward+tribe+journal+sushil+भाटी

यदि राजस्थान सरकार को इस रिपोर्ट को तैयार करने व केंद्र को शीघ्र भेजने में कोई सहायता चाहिए तो हम सहर्ष तैयार है |

इस पोस्ट को समाज में ज्यादा से ज्यादा (व्हाटस ऍप एवम फेसबुक आदि ) पर शेयर करे जिससे अधिक से अधिक व्यक्तियों महत्वपूर्ण जानकारी मिल सके और इस विषय में अग्रिम कार्यवाही संभव हो  सके |

सादर,
मोहित तंवर

पढ़िये गुर्जर किसान आंदोलन पर मोहित तोमर की रिपोर्ट

यह गूजर नहीं किसान आंदोलन है :: भारतीय लोकतंत्र का यह अजीब चेहरा है. देश के किसानों को जब भी कोई बात सरकार तक पहुंचानी होती है, उन्हें आंदोलन करना पड़ता है. वहीं देश के बड़े-बड़े उद्योगपति सीधे मंत्रालय जाकर नियम-क़ानून बदल कर करोड़ों का फायदा उठा लेते हैं. लोकतंत्र से मिलने वाले अवसर और फायदे से भारत की बहुसंख्यक आबादी बहुमत से लगातार दूर होती जा रही है. भारत किसानों का देश है. वह ग़रीब है. सरकार की योजनाओं एवं नीतियों से फायदा मिलना तो दूर, उल्टे नुकसान हो रहा है. किसी भी लोकतंत्र में आंदोलन तब होता है, जब उसकी संस्थाओं के ज़रिए लोगों के बुनियादी सवालों, उनकी समस्याओं का हल निकलना बंद हो जाता है. जब समस्याओं का हल सरकारी तंत्र न कर सके या फिर सरकारी तंत्र की वजह से समस्याएं पैदा होती हों, तब आंदोलन होता है. किसी भी आंदोलन में जनता का समर्थन तब मिलता है, जब पेट में पीड़ा होती है. वैसे भारत के लोग बड़े ही संतोषी हैं. इतनी महंगाई के बावजूद आंदोलन नहीं करते हैं. फिर अगर गूजर आंदोलन कर रहे हैं तो ज़रूर कोई वजह होगी.
गूजर आंदोलन कर रहे हैं. क्या यह आंदोलन आकस्मिक है. ये किसान सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग क्यों कर रहे हैं. गूजरों को गांव में रहने वाले राजपूतों का समर्थन क्यों मिल रहा है. गांव में रहने वाले उच्च जाति के लोग भी सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग को लेकर क्यों आवाज़ उठाने लगे हैं. क्या वजह है कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग शहर के व्यापारी नहीं करते. कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार को अपनी नीतियों और प्राथमिकताओं को पूरी तरह से बदलने का व़क्त आ गया है. विकास के मायने को नया रूप देने का व़क्त आ गया है.
गूजरों का आंदोलन कोई आकस्मिक आंदोलन नहीं है. वे किसी हत्याकांड के विरोध में आंदोलन नहीं कर रहे हैं. गूजर कई सालों से रोज़ी-रोटी के सवाल को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. यह आंदोलन दिल्ली से सटे इलाकों और राजस्थान में फैला है. गूजर सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग कर रहे हैं. उनकी मांग यह है कि उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिले और सरकारी नौकरियों में आरक्षण. अब सवाल यह है कि गूजर अपने पारंपरिक व्यवसाय को छोड़कर सरकारी नौकरियां करना क्यों चाहते हैं. सरकार को लगता है कि अगर गूजरों की मांग मान ली गई तो देश की दूसरी जातियां भी आरक्षण के लिए आंदोलन शुरू कर सकती हैं. यही वजह है कि सरकार इसे राजनीतिक रंग देने में लगी है. गूजरों के आंदोलन को राजनीति के चश्मे से देखना ग़लत है.
गूजर मुख्यत: किसान हैं. उनका जीवन पशुपालन पर निर्भर है. पशुपालन और दूध ही उनकी आय का मुख्य ज़रिया है. सदियों से ये लोग गाय, बकरी और भेड़ पालते रहे, उनका दूध बेचते रहे हैं, लेकिन धीरे-धीरे पशुपालन का भैंसीकरण हो गया. मतलब यह कि भैंस का दूध बाज़ार में छा गया. 1950 से पहले हमारे देश में लोग भैंस नहीं पालते थे. 1950 के बाद से एडीडीपी (एग्रीकल्चर एंड डेयरी डेवलपमेंट प्रोग्राम) की मदद से मिल्क को-ऑपरेटिव का आंदोलन शुरू हुआ. उसी समय दूध की गुणवत्ता मापने का जो मापदंड बना, उसने पशुपालन और दूध के बाज़ार की पूरी दिशा बदल दी. दूध की गुणवत्ता को फैट परसेंटेज से जोड़ दिया गया. मतलब यह कि जिस दूध में जितना ज्यादा फैट, उतना ही बेहतर दूध. मज़े की बात यह है कि फैट को गुणवत्ता का मापदंड इसलिए बनाया गया, क्योंकि इसे लैक्टोमीटर से आसानी से मापा जा सकता है. हमारे अधिकारियों को दूध की गुणवत्ता मापने का सबसे आसान तरीका यही लगा. पांचवें दशक के बाद से जब यह मिल्क को-ऑपरेटिव आंदोलन चला तो उसी के साथ दूध का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल चाय में होने लगा. चाय के अंदर अगर दूध ज़्यादा गहरा हो तो चाय अच्छी मानी जाती है. इन दोनों वजहों से गाय के दूध से ज़्यादा भैंस के दूध की खपत होने लगी. बाज़ार में भैंस के दूध की मांग बढ़ी. देश में पशुपालन के मायने बदल गए. पशुपालन का अर्थ स़िर्फ भैंस पालना रह गया. इससे बहुत बड़ा बदलाव आया. गाय की तरह भैंस खेतों में नहीं चरती. इससे उसका काम नहीं चलता. गांवों में गाय को खरीद कर चारा देने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी. इस वजह से दूध के लिए गूजरों को अब खेत से लाए गए चारे और बाज़ार से खरीदे गए चारे की ज़रूरत पड़ने लगी. अब पिछले 25 सालों में भैंसों के खाने के सामानों (चारा और अन्य उत्पाद) पर नज़र डालें तो भैंसों पर किए गए खर्च और दूध की कीमत में काफी अंतर था. कुछ सालों तक यह एक और तीन के अनुपात में रहा. मतलब भैंसों के खाने पर अगर कोई एक रुपये खर्च करता तो उसे तीन रुपये का दूध मिलता था. गूजरों को फायदा होता था, लेकिन पिछले 10 सालों में तस्वीर बदल गई. भैंस के चारे की कीमत बढ़ गई. इसकी कई वजहें हैं. खेती का तरीका बदला और फसलों में भी बदलाव आया. चारे का उत्पादन कम होता गया. साथ ही पानी की किल्लत शुरू हो गई. वहीं बाज़ार में फैट की इतनी मांग बढ़ती गई कि किसानों ने भैंसों को फूड कांस्नट्रेट (ऐसा खाना जिससे ज्यादा फैट का निर्माण होता है) खिलाना शुरू कर दिया. फूड कांस्नट्रेट को खली से बनाया जाता है. जब सरसों या किसी बीज से तेल निकाला जाता है तो तेल निकालने के बाद जो बच जाता है, उसे खली कहते हैं. जब तेल महंगे हुए तो खली की कीमत बढ़ गई. इस तरह भैसों को जो खिलाया जाता था, वह कई गुना महंगा हो गया, लेकिन सरकार ने शहरी उपभोक्ताओं की वजह से दूध की कीमत नहीं बढ़ने दी. दूसरी परेशानी यह हुई कि बाज़ार में सिंथेटिक (नकली) दूध का अंबार लग गया, जिसकी वजह से बाज़ार के अंदर डिमांड एंड सप्लाई के आधार पर दूध की जो कीमत होनी चाहिए, वह हुई नहीं. साथ ही घी का कारोबार भी गूजरों के लिए मुसीबत हो गया. नकली घी का कारोबार असली घी के कारोबार से कई गुना ज़्यादा है. इसने भी दूध की कीमत नहीं बढ़ने दी. यही वजह है कि पिछले दस सालों से गूजरों को नुकसान होने लगा. आमदनी कम होने की वजह से गूजरों की चिंता बढ़ने लगी. उन्हें अब लगने लगा है कि अपने पारंपरिक व्यवसाय की वजह से वे ग़रीब होते चले जा रहे हैं. अब इससे उनका गुज़ारा नहीं होने वाला है.
गूजर आंदोलन को अगर स़िर्फ जातीय व आरक्षण के चश्मे से देखा गया तो भयंकर भूल हो जाएगी. आज गूजर आंदोलन कर रहे हैं, कल दूसरे किसान आंदोलन करेंगे. आज वे रेल और सड़क जाम कर रहे हैं, कल हथियार भी उठा सकते हैं.
ऐसे मौके पर जब कोई राजनीतिक दल या नेता अच्छे भविष्य के सपने दिखाएगा तो ग़रीबी से जूझ रहे किसानों का समर्थन मिलना लाज़िमी है. अब गूजरों को लग रहा है कि उनके अपने व्यवसाय में फायदा नहीं है और नेता उन्हें नौकरियों में आरक्षण का लालच भी दे रहे हैं. ऐसे में गूजर समुदाय को लग रहा है कि परिवार के किसी एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी मिल गई तो उनकी समस्या हल हो जाएगी. गूजरों ने जब आरक्षण की मांग शुरू की तो उनके सामने एक उदाहरण था, मीणा जाति का. मीणाओं को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने के कारण ही आज सिविल सेवा में उनकी संख्या सबसे अधिक है. गूजर मीणाओं को अपना सबसे बड़ा प्रतियोगी मानते हैं और उन्हें लगता है कि मीणाओं ने सरकारी नौकरियों की वजह से सरकारी संसाधनों पर एकाधिकार स्थापित कर लिया है. गूजरों को लगता है कि आरक्षण मिलने के बाद उनकी भी सामाजिक हैसियत मीणाओं जैसी हो जाएगी. गूजर आंदोलन को जातीय पहचान की लड़ाई समझना ग़लत होगा, क्योंकि इसकी जड़ में आर्थिक और सामाजिक विषमताएं हैं. हां, यह बात ज़रूर है कि विषमताओं के खिला़फ लड़ने और लोगों को संगठित करने के लिए किसी पहचान की ज़रूरत होती है, जो आंदोलन की धुरी बने. इस आंदोलन में गूजर जातिसूचक न होकर किसानों की समस्याओं और सरकारी नीतियों की विफलताओं के खिला़फ मुहिम का नाम है. किसानों के प्रति सरकार की जो अनदेखी है, वह कहीं गूजर, कहीं यादव या कहीं कुर्मी के नाम से आंदोलन शुरू कर सकती है.
70 के दशक में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महेंद्र सिंह टिकैत ने एक किसान आंदोलन खड़ा किया था. उन्हें किसानों का ज़बरदस्त समर्थन मिला. उस समय भी गन्ना, गेहूं, जौ और चने की खेती करने वाले किसानों की हालत वैसी ही थी, जैसी आज गूजरों की है. गन्ना, गेहूं, जौ और चना पैदा करने की लागत ज़्यादा हो गई और सरकार ने इन फसलों की कीमत नियंत्रित कर रखी थी. किसानों को खेती से नुक़सान हो रहा था. बाद में स्थिति में बदलाव आया तो यह किसान आंदोलन शांत हुआ. महेंद्र सिंह टिकैत और गूजर आंदोलन की वजह एक है, लेकिन फर्क़ स़िर्फ इतना है कि गूजर अब अपने व्यवसाय में फायदा-नुकसान को छोड़कर सरकारी नौकरी के लिए आंदोलन कर रहे हैं.
1991 के उदारीकरण के बाद से सरकारी नीतियों का ध्यान किसानों और मज़दूरों की समस्याओं से दूर हटकर उद्योगपतियों, व्यापारियों और शहरी लोगों पर टिक गया. विकास का मापदंड बदल गया है. सरकार ने अपने दायित्व को ही नए ढंग से परिभाषित कर दिया है. सरकार मूलभूत ढांचे को बेहतर करती है तो औद्योगिक विकास एजेंडे पर होता है. विकास की परिभाषा विदेशी निवेश, जीडीपी और सेंसेक्स से तय की जाती है. जब भी सरकार बाज़ार को मुक्त करने की बात करती है या इस संदर्भ में कोई फैसले लेती है तो उसका सारा फायदा बड़े-बड़े उद्योगपति ले जाते हैं. शिक्षा में सुधार की बात होती है तो मामला विदेशी विश्वविद्यालयों को देश के शहरों में जगह देने पर रुक जाता है. गांवों में चलने वाली सरकारी योजना भ्रष्टाचार की बलि चढ़ जाती है. कृषि हो या उद्योग, विदेशी कंपनियों को सारी सुविधाएं और भारतीय बाज़ार उपलब्ध कराने को सरकार अपनी सफलता बताती है. ओबामा, बेन जियाबाओ या फिर सरकोजी आते हैं तो फैसले देश के बड़े-बड़े उद्योगपतियों के साथ मिल-बैठकर लिए जाते हैं. हद तो यह है कि अब दुनिया के बड़े-बड़े उद्योग घरानों को खुदरा बाज़ार में लाने की तैयारी हो गई है. वैसे भी अंबानी और बिरला पहले से ही खुदरा बाज़ार में स्थापित हो चुके हैं. सरकारी नीतियों से लगातार कृषि और उससे जुड़े उत्पादों पर आश्रित लोगों को नुकसान ही नुकसान हो रहा है.
सरकार की प्राथमिकता सा़फ है. उद्योगपतियों, व्यापारियों और शहर के लोगों का चेहरा देखकर सरकार योजना बनाती है. महंगाई पर हाय-तौबा तब मचती है, जब उन उत्पादों की कीमत बढ़ती है, जिनका रिश्ता शहर में रहने वाले लोगों से है. अ़खबार में महंगाई को लेकर खबर छपती है तो सरकार भी नीतियां बदल देती है. विपक्ष भी हंगामा करने लगता है. मीडिया भी एक्टिव हो जाता है. अ़खबार और टीवी वाले पेट्रोल की कीमत पर हाय-तौबा करते हैं तो यह बात समझ में भी आती है कि अ़खबार के पाठक और टीवी दर्शक शहरी होते हैं, लेकिन राजनीतिक दल इतने मूर्ख हैं कि मीडिया के साथ वे भी सुर में सुर मिलाकर हंगामा करने लगते हैं. इन राजनीतिक दलों को यह समझ में ही नहीं आता है कि वे जिनके लिए लड़ रहे हैं, वे तो वोट भी देने नहीं जाते. शहरों में तो वोटिंग 30 फीसदी होती है. लेकिन शहरी उच्च और मध्य वर्ग को खुश करने के लिए राजनीतिक दल अपनी शक्ति झोंक देते हैं. वहीं जब किसानों और ग्रामीणों की मुसीबतें बढ़ती हैं तो न मीडिया, न सरकार और न ही विपक्ष उनकी आवाज़ उठाता है. उन्हें अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है. भारत के ग्रामीण बेसहारा हो चुके हैं. उनकी मुसीबतें बढ़ रही हैं, लेकिन उन्हें सुनने वाला कोई नहीं है. अब ऐसे में सरकारी नीतियों के सताए हुए किसान कहां जाएं? क्या करें? किससे अपनी गुहार लगाएं? सांसद उनकी आवाज़ नहीं उठाते. अधिकारियों तक उनकी आवाज़ नहीं पहुंचती. देश की विभिन्न संस्थाओं ने किसानों की परेशानियों को अनसुना करने की कसम खा रखी है. ऐसी सोई हुई व्यवस्था तक अपनी आवाज़ पहुंचाने और उसे जगाने के लिए आंदोलन के अलावा और क्या रास्ता है. यही वजह है कि गूजर आंदोलन कर रहे हैं. यही वजह है, जब किसानों की ज़मीन हड़पी जाती है तो उन्हें प्रदर्शन करना पड़ता है. यह प्रदर्शन कभी-कभी हिंसक रूप भी अख्तियार कर लेता है. जहां-जहां किसानों को नुक़सान होता है, वहां वे आंदोलन करते हैं. देश चलाने वाली सारी संस्थाओं को इन सवालों पर ग़ौर करना होगा, हल निकालना होगा.
गूजर आंदोलन को अगर स़िर्फ जातीय व आरक्षण के चश्मे से देखा गया तो भयंकर भूल हो जाएगी. आज गूजर आंदोलन कर रहे हैं, कल दूसरे किसान आंदोलन करेंगे. आज वे रेल और सड़क जाम कर रहे हैं, कल हथियार भी उठा सकते हैं. अगर ऐसा हो गया तो सरकारी तंत्र के पास उनसे लड़ने का कोई हथियार नहीं बचेगा. यह देश चलाने लायक नहीं रह पाएगा
मोहित तोमर

विमुक्त जाति आरक्षण को लेकर गुर्जर नेताओं ने की केंद्रीय मंत्री से चर्चा

नई दिल्ली| विमुक्त जाति आरक्षण पर चर्चा के लिए केंद्रीय सामाजिक अधिकारिता मंत्री श्री कृष्णपाल जी गुर्जर ने गुर्जर यूनिटी फाउंडेशन के राष्ट्रीय संयोजक गुर्जर शेषराज सिंह जी पंवार, केंद्रीय खादी बोर्ड भारत सरकार के पूर्व चेयरमैन एवं अखिल भारतीय गुर्जर महासभा के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. यशवीर सिंह जी चौहान एवं सामाजिक कार्यकर्ता श्री मोहित जी तोमर को आमंत्रित किया गया।केन्द्र सरकार के सचिव मीणा जी भी चर्चा मे शामिल थे| डा. यशवीर सिंह जी द्वारा एतिहासिक पृष्ठ भूमि मंत्री जी के समक्ष रखी गई और लाकुर कमेटी और रेनके आयोग की संस्तुतियाँ लागू करने की माँग की गई| शेषराज सिंह जी पंवार और मोहित जी तोमर के द्वारा शासनादेश मे संसोधन और आर्थिक शैक्षिक सुविधाएँ बहाल करने का पक्ष रखा गया और बार बार की जा रही ग़लती की बात रखी गई। शीघ्र उत्तरप्रदेश सरकार के अधिकारियों को संसद अधिवेशन के बाद बुलाने का निर्णय लिया गया

पर्यावरण संरक्षण के क्षैत्र में समर्पित एक सामाजिक यायावर.....

प्रोफ़ेसर पिता का पुत्र होने के बावजूद मेरा जन्म गांव में हुआ | बचपन गांव में बीता हायर सेकेंडरी तक की शिक्षा ग्रामीण परिवेश में ही संपन्न हुई | हालांकि मेरा गांव एक विशाल मैदान के बीच में स्थित है | जिसके चारों ओर विंध्याचल की ऊंची नीची- पर्वत श्रेणियां फैली हुई है, यह पर्वत श्रेणियां वनाच्छादित थी | हालांकि अब भी है पर अब वह बात नहीं | गांव के चारों ओर आम के सघन बगीचे थे | जिनमें विशालकाय आम के दरख्त थे इसके अलावा पीपल, नीम, बरगद, करंज, इमली आदि के वृक्ष भी थे | गांव के बाजू में बहती नदी सदानीरा थी, जिसम 10 -15 फीट की गहराई तक पानी भरा रहता था | नदी के किनारे अर्जुन और गूलर के वृक्षों से ढके थे | कुएं पूरे वर्ष पर्याप्त पानी देते थे  | गर्मी के मौसम में तापमान 42 डिग्री से ज्यादा नहीं हुआ करता था, रात के समय छत पर रजाई ओढ़ कर ही सोना पड़ता था |

               समय बदला सिंचाई के साधनों के व्यापक प्रचार-प्रसार के कारण, बोरवेल के कारण, गिरते भूजल स्तर एवं नदी के पानी के अनियंत्रित दोहन से लगभग 20 वर्ष पहले नदी सुख गई |

                 बचपन में पेड़ पौधे लगाने का शौक मुझे माता- पिता एवं दादा से मिला माताजी घर की क्यारियों में फूलों के पौधे लगाया करती थी | पिताजी शहर आने- जाने के सिलसिले में घर पर विभिन्न प्रजातियां के पौधे लाया करते थे |  दादाजी आम, जामुन, नीम, करंज, इमली, सागौन, जामुन आदि के बीज संग्रह करते थे | जिन्हें वो कच्चे रास्तों और नदी के किनारों पर लगा देते थे | आज भी उनके लगाए सैकड़ों पेड़ शान से खड़े हुए हैं |

             मैं बचपन से ही अपने स्तर पर अपनी निजी कृषि भूमि पर पेड़ पौधे लगाता रहा | पर    व्यवस्थित रुप से निजी/ सार्वजनिक भूमि पर वृक्षारोपण करने /करवाने का सिलसिला मैंने वर्ष 2005 से प्रारंभ किया | अपने घर में भी निजी साधनों से एक छोटी नर्सरी तैयार कर प्रतिवर्ष कम से कम 2000 पौधे लगाने/बांटने का सिलसिला प्रारंभ किया | गांव की प्रचलित परंपरा के अनुसार सर्वप्रथम ग्रामीणों ने उपहास किया | विरोध किया और यहां तक कि मेरे लगाए पेड़ पौधों का नुकसान भी किया | गांव के मंदिर की भूमि पर कब्जा करने वाले एक परिवार के साथ मेरे वृक्षारोपण को लेकर कोर्ट में केस तक चला.... पर कुछ सहयोगियों के साथ मेरा कारवां बढ़ता ही गया साथ में मेरा समर्थन भी ! आज तक में 10000 से भी ज्यादा वृक्ष लगा चुका हूं | गांव फिर से हरा-भरा हो गया है , नदी में पानी अब भी नहीं रहता पर नदी और सभी नालों के किनारे आज हरे भरे हैं |

    अब तमन्ना यह है कि नदी में वर्ष भर पानी रहे ....नदी बहती रहे.....
मेरा अभियान आज भी जारी है | आइए हम सब मिलकर हरा भरा भारत बनाएं | क्या इस अभियान में आप मेरा साथ देंगे..??
          

चौधरी राजेश मोहन (एड•)

मो•- 7773880410

ग्राम- छिंदली , पोस्ट बिजौरा तहसील देवरी जिला सागर (म•प्र)

भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग गुर्जरी तोड़ी

भारतीय शास्त्रीय संगीत में ((राग गुर्जरी तोड़ी))-

सम्पूर्ण भारतवर्ष में सिर्फ गुर्जर ही एकमात्र जाति रही हैं,जिसके अदम्य साहस व वीरता के प्रभाव ने भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रयोग होने वाले राग गुर्जरी तोड़ी को जन्म दिया।
विशेष - राग तोडी में पंचम स्वर को वर्ज्य करने से एक अलग प्रभाव वाला राग गुर्जरी तोडी बनता है। इस राग को गुजरी तोडी भी कहते हैं। इस राग की प्रकृति गंभीर है। यह भक्ति तथा करुण रस से परिपूर्ण राग है।
राग तोड़ी की अपेक्षा इस राग में कोमल रिषभ को दीर्घ रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इस राग का विस्तार तीनों सप्तकों में किया जा सकता है। यह स्वर संगतियाँ राग गुर्जरी तोडी का रूप दर्शाती हैं -
सा ; ,नि ,ध१ ; ,म् ,ध१ ; ,म् ,नि ,ध१ ; ,नि ,नि सा ; सा रे१ ; सा रे१ ग१ ; ग१ रे१ ,नि ,ध१ ; ,ध१ ,नि ,नि सा ; सा रे१ ग१ म् ; ध१ म् ध१ ; म् ध१ नि सा' ; ध१ नि सा' ; ध१ नि सा' रे१' ; ग१' रे१' नि ध१ ; म् ध१ नि सा' रे१' ; ध१ सा' ; ध१ सा' रे१' नि ध१ म् ; ध१ नि ध१ म् ; ग१ म् ध१ ; म् ग१ रे१ सा ।।।

रविवार, 30 जुलाई 2017

भारतीय सेना के हरदम साथी जम्मू और कश्मीर के गुज्जर

भारतीय सेना : गुज्जर बटालियन :- पाकिस्तान का रिटायर्ड मेजर जनरल मुकीश खान ने अपनी पुस्तक ‘Crisis off Leadership’ में लिखा है कि, भारतीय सेना का एक अभिन्न अंग होते हुए भी, भारतीय सेना गुज्जरो के शौर्य से अंजान ही रही क्योंकि…..’घर की मुर्गी दाल बराबर !’भारतीय सेना को गुज्जरो की वीरता से कभी सीधा वास्ता नही पड़ा था ! दुश्मनों को पड़ा था और उन्होंने इनकी शौर्य गाथाएं भी लिखी! स्वयं पाकिस्तानी सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल मुकीश खान ने अपनी पुस्तक‘ Crisis of Leadership’के प्रष्ट २५० पर, वे गुज्जरो के साथ हुई अपनी १९७१ की मुठभेड़ पर लिखते हैं कि, “हमारी हार का मुख्य कारण था, हमारा गुज्जरो से आमने सामने युद्ध करना! हम उनके आगे कुछ भी करने में असमर्थ थे! गुज्जर बहुत बहादुर हैं और उनमें शहीद होने का एक विशेष जज्बा—एक महत्वाकांक्षा है! वे अत्यंत बहादुरी से लड़ते हैं और उनमें सामर्थ्य है कि अपने से कई गुना संख्या में अधिक सेना को भी वे परास्त कर सकते हैं!” वे आगे लिखते हैं कि……..‘३ दिसंबर १९७१ को हमने अपनी पूर्ण क्षमता और दिलेरी के साथ अपने इन्फैंट्री ब्रिगेड के साथ भारतीय सेना पर हुसैनीवाला के समीप आक्रमण किया! हमारी इस ब्रिगेड में पाकिस्तान की लड़ाकू बलूच रेजिमेंट और जाट रेजिमेंट भी थीं ! और कुछ ही क्षणों में हमने भारतीय सेना के पाँव उखाड़ दिए और उन्हें काफी पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया! उनकी महत्वपूर्ण सुरक्षा चौकियां अब हमारे कब्ज़े में थीं! भारतीय
सेना बड़ी तेजी से पीछे हट रही थीं और पाकिस्तानी सेना अत्यंत उत्साह के साथ बड़ी तेजी से आगे बढ रही थी! हमारी सेना अब कौसरे - हिंद पोस्ट के समीप पहुँच चुकी थी! भारतीय सेना की एक छोटी टुकड़ी वहां उस पोस्ट की सुरक्षा के लिए तैनात थी और इस टुकड़ी के सैनिक गुज्जर बटालियन से संबंधित थे! एक छोटी सी गिनती वाली गुज्जर बटालियन ने लोहे की दीवार बन कर हमारा रास्ता अवरुद्ध कर दिया ! उन्होंने हम पर भूखे शेरों की तरह और बाज़ की तेजी से आक्रमण किया! ये सभी सैनिक गुज्जर थे! यहाँ एक आमने-सामने की, आर-पार की, सैनिक से सैनिक की लड़ाई हुई! इस आर-पार की लड़ाई में भी गुज्जर सैनिक इतनी बेमिसाल बहादुरी से लड़े कि हमारी सारी महत्वाकांक्षाएं, हमारी सभी आशाएं धूमिल हो उठीं, हमारी उम्मीदों पर पानी फिर गया ! हमारे सभी सपने चकना चूर हो गये!’ इस जंग में बलूच रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट कर्नल गुलाब हुसैन शहादत
को प्राप्त हुए थे! उनके साथ ही मेजर मोहम्मद जईफ और कप्तान आरिफ अलीम भी अल्लाह को प्यारे हुए थे! उन अन्य पाकिस्तानी सैनिकों की गिनती कर पाना मुश्किल था जो इस जंग में शहीद हुए ! हम आश्चर्यचकित थे मुट्ठीभर गुज्जरो के साहस और उनकी इस बेमिसाल बहादुरी पर! जब हमने इस तीन मंजिला कंक्रीट की बनी पोस्ट पर कब्जा किया, तो गुज्जर इस
की छत पर चले गये, जम कर हमारा विरोध करते रहे —हम से लोहा लेते रहे! सारी रात वे हम पर फायरिंग करते रहे और सारी रात वे अपने उदघोष, अपने जयकारे' से आकाश गुंजायमान करते रहे! इन गुज्जर सैनिकों ने अपना प्रतिरोध अगले दिन तक जारी रखा, जब तक कि पाकिस्तानी सेना के टैंकों ने इसे चारों और से नहीं घेर लिया और इस सुरक्षा पोस्ट को गोलों से न उड़ा डाला! वे सभी मुट्ठी भर गुज्जर सैनिक इस जंग में हमारा मुकाबला करते हुए शहीद हो गये, परन्तु तभी अन्य गुज्जर सैनिकों ने तोपखाने की मदद से हमारे टैंकों को नष्ट कर दिया! बड़ी बहादुरी से लड़ते हुए, इन गुज्जर सैनिकों ने मोर्चे में अपनी बढ़त कायम रखी और इस तरह हमारी सेना को हार का मुंह देखना पड़ा! ‘…..अफ़सोस ! इन मुट्ठी भर गुज्जर सैनिकों ने हमारे इस महान विजय अभियान को हार में बदल डाला, हमारे विश्वास और हौंसले को चकनाचूर करके रख डाला! ऐसा ही हमारे साथ ढाका (बंगला-देश) में भी हुआ था! जस्सूर की लड़ाई में गुज्जरो ने पाकिस्तानी सेना से इतनी बहादुरी से प्रतिरोध किया कि हमारी रीढ़ तोड़ कर रख दी, हमारे पैर उखाड़ दिए ! यह हमारी हार का सबसे मुख्य और महत्वपूरण कारण था ! गुज्जरो का शहीदी के प्रति प्यार, और सुरक्षा के लिए मौत का उपहास तथा देश के लिए सम्मान, उनकी विजय का एकमात्र कारण था|